राजस्थान का विजयी किला, जहां से दिखता है पूरा पाकिस्तान
जोधपुर का मेहरानगढ़ किला 120 मीटर ऊंची एक पहाड़ी पर बना हुआ है। इस तरह से यह किला दिल्ली के कुतुब मीनार की ऊंचाई 73 मीटर से भी ऊंचा है। किले के परिसर में सती माता का मंदिर भी है। सन 1843 में महाराजा मान सिंह का निधन होने के बाद उनकी पत्नी ने चिता पर बैठकर जान दे दी थी।

यह मंदिर उसी की याद में बनाया गया। 1000 साल पहले बने इस किले जैसा हूबहू किला बहावलपुर सिंध पाकिस्तान में है जो किशनगढ़ के सामने पाकिस्तान की तरफ है।

सन 1965 के भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तानी सेना ने इसी किले पर हमला बोला था। जिसके बाद भारतीय सेना ने मुंहतोड़ जवाब देते हुए उन्हें वापस खदेड़ दिया था। पाकिस्तानी सेना ने इसी दुर्ग में अपनी सीमा चौकी स्थापित की थी। बाद में इसे ताशकंद समझौते के तहत भारत को वापस कर दिया गया था। किले की खासियत यह है कि एक बार इस किले में जाने के बाद उसे खोजना काफी मुश्किल होता था।

इस किले के दीवारों की परिधि 10 किलोमीटर तक फैली है। इनकी ऊंचाई 20 फुट से 120 फुट तथा चौड़ाई 12 फुट से 70 फुट तक है। इसके परकोटे में दुर्गम रास्तों वाले सात आरक्षित दुर्ग बने हुए थे। घुमावदार सड़कों से जुड़े इस किले के चार द्वार हैं। किले के अंदर कई भव्य महल, अद्भुत नक्काशीदार दरवाजे, जालीदार खिड़कियां हैं।

जोधपुर शासक राव जोधा ने 12 मई 1459 को इस किले की नींव डाली और महाराज जसवंत सिंह (1638-78) ने इसे पूरा किया। इस किले में बने महलों में से उल्लेखनीय हैं मोती महल, फूल महल, शीश महल, सिलेह खाना, दौलत खाना आदि।

मंदिर:

राव जोधा को चामुंडा माता में अथाह श्रद्धा थी। चामुंडा जोधपुर के शासकों की कुलदेवी रही हैं। राव जोधा ने 1460 मे मेहरानगढ़ किले के समीप चामुंडा माता का मंदिर बनवाया और मूर्ति की स्थापना की। माना जाता है कि 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान सबसे पहले जोधपुर को टारगेट बनाया गया। माना जाता है कि इस दौरान माता की कृपा से यहां के लोगों का बाल भी बांका नहीं हुआ था।

संग्रहालय:

जय पोल गेट महाराजा मान सिंह द्वारा बीकानेर और जयपुर की सेनाओं पर अपनी जीत का जश्न मनाने के लिए बनाया गया था। मुगलों के खिलाफ अपनी जीत की याद में एक और गेट फतेह पोल महाराजा अजीत सिंह द्वारा भी बनवाया गया था। किले की एक हिस्सा संग्रहालय में बदल दिया गया जहाँ शाही पालकियों का एक बड़ा संग्रह है। इस संग्रहालय में 14 कमरे हैं जो शाही हथियारों, गहनों, और वेशभूषाओं से सजे हैं। इसके अलावा, आगंतुक यहाँ मोती महल, फूल महल, शीशा महल, और झाँकी महल जैसे चार कमरे भी देख सकते हैं।

मोती महल:

मोती महल, जिसे पर्ल पैलेस के रूप में भी जाना जाता है, किले का सबसे बड़ा कमरा है। यह महल राजा सूर सिंह द्वारा बनवाया गया था, जहां वे अपनी प्रजा से मिलते थे। यहाँ पर्यटक श्रीनगर चौकी, जोधपुर के शाही सिंहासन को भी देख सकते हैं। यहाँ पाँच छिपी बाल्कनी हैं जहां से राजा की पाँच रानियाँ अदालत की कार्यवाही सुनती थी।

फूल महल:

फूल महल मेहरानगढ़ किले के विशालतम कमरों में से एक है। यह महल राजा का निजी कक्ष था। इसे फूलों के पैलेस के रूप में भी जाना जाता है, इसमें एक छत है जिसमें सोने की महीन कारीगरी है। महाराजा अभय सिंह ने 18 वीं सदी में इस महल का निर्माण करवाया। माना जाता है कि मुगल योद्धा, सरबुलन्द खान पर राजा की जीत के बाद अहमदाबाद से यह सोना लूटा गया था। शाही चित्र और रागमाला चित्रकला महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय के शासनकाल के दौरान महल में लाये गये थे।

शीशमहल:

शीश महल सुंदर शीशे के काम से सजा है। आगंतुक शीशा महल में चित्रित धार्मिक आकृतियों के काम को देख सकते हैं। इसे शीशे के हॉल के रूप में भी जाना जाता है। एक तखत विला, जिसे तखत सिंह द्वारा बनवाया गया था, भी देखा जा सकता है। ये जोधपुर के अंतिम शासक और मेहरानगढ़ किले का निवासी थे। विला का वास्तुशिल्प पारंपरिक और औपनिवेशिक दोनों शैलियों को प्रदर्शित करता है।

झाँकी महल:

झाँकी महल, जहाँ से शाही महिलायें आंगन में हो रहे सरकारी कार्यवाही को देखती थीं, एक सुंदर महल है। वर्तमान में, यह महल शाही पालनों का एक विशाल संग्रह है। ये पालने, गिल्ट दर्पण और पक्षियों, हाथियों, और परियों की आकृतियों से सजे हैं। -शीश्रम सैनी