योग और आपकी जीवनशैली :

हमारे स्वास्थ्य का आधार योग है।

योग इस प्रवाह को संतुलित कर आपको प्राकृतिक स्वास्थ्य एवं सौंदर्य प्रदान करता है। योग के आसन जहां शारीरिक स्तर पर विभिन्न ग्रंथियों को स्वस्थ कर शारीरिक स्वास्थ्य प्रदान करते हैं, वहीं मन को संयमित और आनन्दमय भी बनाते हैं। हमारे प्राचीन महर्षियों ने देखा कि इस स्वस्थ शरीर और मन का संचालन हमारे अंदर स्थित ऊर्जा का एक सूक्ष्म स्तर करता है। इसका कारण है योग का ऊर्जा के सूक्ष्म प्राणिक (प्राण ऊर्जा) स्तर पर काम करना। यहां ऊर्जा का प्रवाह संतुलित और स्वच्छ होना चाहिए।

आपका स्वास्थ्य आपकी शारीरिक, मानसिक और प्राणिक स्थिति पर निर्भर करता है। योग वस्तुत: जीवन का प्रवाह है। योग से संबंधित कुछ विशिष्ट आसन:-

पद्मासन:-

पद्म का अर्थ होता है ‘कमल’। यह आसन हमारे शरीर में स्थित विभिन्न ऊर्जा केंद्रों को सक्रि य करता है। योग में इन ऊर्जा-केंद्रों को कमल के पुष्प की भांति देखा गया है। इस आसन में शारीरिक स्थिति कमल के पुष्प की भांति हो जाती है, अत: इसे ‘पद्मासन’ कहते हैं।

क्रिया:-

सर्वप्रथम समतल जमीन पर दरी बिछाकर बैठ जाएं। दाहिने पैर को घुटने से मोड़ कर बायीं जंघा पर रखें। ठीक इसी प्रकार बाएं पैर को घुटने से मोड़ कर दाहिनी जंघा पर रखें। दोनों हाथों के बीच में एक दूसरे के ऊपर रखें अथवा कोई विशिष्ट मुद्रा धारण करें। यह पद्मासन की स्थिति है। इस समय आप अपनी दृष्टि को किसी विशिष्ट वस्तु, जैसे- ज्योति, ॐ आदि पर केंद्रित कर सकते हैं। यह आसन ध्यान एवं प्राणायाम के अभ्यास के लिए अत्यधिक लाभकारी है।

शशांकासन:-

यह आसन ऊर्जा के प्रवाह को ऊर्ध्वगामी बनाने में अत्यधिक सहायक है। ऊर्जा का ऊपर की ओर प्रवाह न केवल ऊर्जा के स्तर को संतुलित कर हमें स्वस्थ करता है, बल्कि हमारे अध्यात्मिक-जीवन को भी स्वस्थ बनाता हैं। इस आसन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे करने से वज्रासन के भी सभी लाभ प्राप्त हो जाते हैं। शशांकासन में शारीरिक स्थिति अर्द्धचंद्र की भांति हो जाती हैं।

क्रिया:-

सबसे पहले समतल जमीन पर दरी बिछाकर दोनों पैरों को सामने की ओर फैलाकर बैठ जाएं। दाएं पैर को घुटने से मोड़कर दाहिनी एड़ी की दाहिने नितम्ब के नीचे रखें। ठीक इसी प्रकार बायें पैर को मोड़कर बायीं एड़ी को दाएं नितम्ब के नीचे रखें। यह वज्रासन की पूर्ण स्थिति है।

प्रथमत:

अपने पेट के भाग को नितम्ब से लगाएं, फिर छाती को और अंत में धीरे से माथे को जमीन से लगा दें। यह शशांकासन की पूर्ण स्थिति है। इस स्थिति में अपने श्वास प्रश्वास को सामान्य रखें। रीढ़ को ऊपर की ओर तानकर धीरे-धीरे श्वास छोड़ते हुए सामने की ओर झुकें। शुरू में यथाशक्ति रुकने का प्रयास करें। फिर धीरे-धीरे समय-सीमा को बढ़ाकर प्रत्येक आसन तीन मिनट तक करें।

अर्द्धमत्स्येन्द्रासन:-

सामान्य-जन इस आसान की पूर्ण स्थिति में आसानी से नहीं पहुंच सकते, परंतु इसका आधा भाग ही पूर्ण स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त है। इसका नाम योग के प्रख्यात महर्षि मत्स्येंद्रनाथ के नाम पर है। यह आसन संपूर्ण उदर रोगों, मधुमेह, स्थूलता आदि को दूर करता है।

क्रिया:-

सबसे पहले समतल जमीन पर दरी बिछाकर पैरों को सामने की ओर फैलाकर बैठ जाएं। पैर के दाएं घुटने को पास से मोड़कर दाहिनी एड़ी को बाएं नितम्ब के पास लाएं। बायें पैर को घुटने से मोड़कर सीधी स्थिति में दाहिने घुटने के बगल में दाहिनी ओर रखें। फिर दाहिने हाथ को बायीं ओर से ले जाकर बायें पैर के अंगूठे को पकड़ें। बायें हाथ को पीठ पर पीछे की ओर रखें। बायीं ओर पीछे देखें। यह अर्द्धमत्स्येंद्रासन की पूर्ण स्थिति है। प्रत्येक श्वास प्रश्वास के साथ अपने ईष्ट देव के नाम का अंदर जाप करें। ठीक इसी प्रकार आसन को दूसरी ओर से करें।

भद्रासन:-

इस आसन का विशेष प्रभाव जननांगों, मूत्रेन्द्रिय एवं संपूर्ण टांगों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। भद्रासन ऊर्जा के प्रवाह को संतुलित करने में सहायता देता है।

क्रिया:-

सर्वप्रथम समतल जमीन पर दरी बिछाकर पैरों को सामने की ओर फैलाकर बैठ जाएं। बायें पैर को घुटने से मोड़कर बायी एड़ी को मूत्रेन्द्रिय से नीचे सीवनी पर लगायें। इसी प्रकार दाहिने पैर को घुटने से मोड़कर दाहिनी एड़ी को मूत्रेन्द्रिय से नीचे सीवनी पर लगायें। इसी प्रकार दोनों एड़ियां आपस में मिली रहेंगी। अब दोनों हाथों द्वारा पैरों को अग्र भाग से पकड़ कर रखें। यह भद्रासन की पूर्ण स्थिति है। अपनी दृष्टि को श्वास के सूक्ष्म प्रवाह अथवा किसी विशिष्ट प्रतीक पर केन्द्रित करें।
सदा ध्यान रखें, योग शारीरिक, मानसिक एवं प्राणिक ऊर्जा के संतुलन का अनुपम साधन है। आपके द्वारा किया गया हर एक प्रयास आपको स्वास्थ्य के नये आयामों की ओर ले जायेगा।

आसनों का अभ्यास हमेशा ही प्रात:

काल खाली पेट करें तो ज्यादा लाभकारी है। वैसे आप आसनों का अभ्यास कभी भी कर सकते हैं, बशर्ते आपका पेट खाली होना चाहिए। भोजन के उपरांत कम से कम चार घंटे का अंतराल आवश्यक है। आसनों को करते समय श्वास प्रश्वास को सामान्य रखें एवं ध्यान की एकाग्रता बनाएं रखें।

आप जितना अधिक इन आसनों का ध्यानपूर्वक अभ्यास करेंगे, उतने ही विशिष्ट परिणाम होंगे ।
– राजा तालुकदार