छत्तीसगढ़ सैर-सपाटा : छत्तीसगढ़ भारत का 26 वां राज्य है जो 1 नवम्बर सन् 2000 को अस्तित्व में आया। इसकी सीमाएं महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश एवं आंध्र प्रदेश से मिलती हैं। यह आदिवासी राज्य है। यहां छोटी-बड़ी कुल 35 तरह की आदिवासी जातियां पूरे राज्य में फैली हुई हैं! राज्य के उत्तर में सतपुड़ा का उच्चतम भू-भाग है तो मध्य में महानदी तथा उसकी सहायक नदियों का मैदानी भाग है। इसके दक्षिण में बस्तर का विस्तृत पठार है।

छत्तीसगढ़ का भू-भाग पुरातत्वीय और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत संपन्न है। महानदी, शिवनाथ और हसदो आदि नदियों के जल से सिंचित यह अंचल अत्यधिक उर्वर है। साथ ही प्राकृतिक सौन्दर्य और खनिज संपदा से परिपूर्ण है। सदाबहार लहलहाते हुए सुरम्य वन तथा जनजातियों के नृत्य संगीत यहां के आकर्षण हैं।

चूंकि यह राज्य कर्क रेखा पर स्थित है अत: ग्रीष्मकाल में यह गर्म रहता है तथा शीतकाल में यहां खूब ठंड पड़ती है। औसत वर्षा 60 इंच होती है। अनेक नदियों का उद्गम स्थल होने से यहां जल का अभाव नहीं है। गंगा, महानदी, नर्मदा और गोदावरी प्रवाह-क्रम के बीच महत्त्वपूर्ण जलविभाजक का काम करता है। यहां प्रमुख प्रवाह क्रम महानदी है जिसका जल संग्रहण क्षेत्र प्रदेश के लगभग 55 प्रतिशत भाग में विस्तृत है।

महानदी राज्य की सबसे प्रमुख एवं सबसे बड़ी नदी है।
राष्ट्रीय उद्यान एवं अभयारण्य की बात करें, तो पश्चिमी सरगुजा का संजय उद्यान, दंतेवाड़ा स्थित इंद्रावती जगदलपुर स्थित कांगेर घाटी उद्यान भी दर्शनीय है। वहीं दलसील, बारनवापुरा, सीतानदी, अचानकमार, सेमरसोत, तमोरपिंगल, भैरमगढ़, पामेढ, उदंती एवं गोमरदा अभ्यारण्य भी दर्शनीय है। रायपुर-रायगढ़ और सरगुजा पहुंच कर आप वन्य- पर्यावरण पर्यटन का पूरा लाभ उठा सकते है।

रायपुर निकटतम हवाई अड्डा है जो नागपुर तथा दिल्ली से नियमित वायुयान सेवा से जुड़ा हुआ है जबकि रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, भिलाई, राजगढ़, सरगुजा अंबिकापुर रेल मार्ग एवं सड़क मार्ग से भी पूरे देश से जुड़ा है। प्रदेश के लगभग सभी प्रमुख शहरों में आधुनिक सुविधाओं से युक्त होटल एवं धर्मशालाएं ठहरने हेतु उपयुक्त हैं। लोक-निर्माण विभाग, वन विभाग एवं जल संसाधन विभाग के विश्राम गृह भी उपलब्ध हैं, जहां अनुमति लेकर ठहरा जा सकता है।

प्रमुख दर्शनीय स्थल

राजिम – रायपुर से प्रस्थान कर 48 किमी. का सफर तय करने के पश्चात राजिम पहुंचा जा सकता है, जो महानदी एवं पेरी नदी के संगम पर बसा है। यहां कुलेश्वर महादेव, राजिम लोचन मंदिर एवं राजेश्वर मंदिर समूहों का दर्शन किया जा सकता है। कुलेश्वर महादेव मंदिर ग्यारहवीं सदी का मंदिर है जो पेरी एवं महानदी के संगम पर स्थित है, विशेष रूप से दर्शनीय है। राजिम लोचन मंदिर में विष्णु जी की चर्तुर्भुजी प्रतिमा स्थापित है।

चम्पारण्य

चम्पारण्य वैष्णव संप्रदाय के प्रवर्तक वल्लभाचार्य की जन्मस्थली है। 20 वीं शताब्दी के प्रथम दशक में श्री बल्लभाचार्य के अनुयायियों ने उनकी स्मृति में एक मंदिर का निर्माण किया। समीप के जंगल में चंपकेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर है।

आरंग –

यह रायपुर से संबलपुर मार्ग पर 34 किमी दूर स्थित मंदिरों की नगरी है। यहां स्थित 11 वीं सदी का प्राचीन भांड देवल मंदिर दर्शनीय है। इसके अतिरिक्त बाद्यदेवन महामाल दंतेश्वरी और कई छोटे बड़े जैन मंदिर दर्शनीय हैं।

सिरपुर –

रायपुर से लगभग 88 कि.मी. की दूरी पर राष्ट्रीय राजमार्ग से 14 कि.मी. दूर सिरपुर कभी समृद्ध नगरी भी कहलाती थी। पांचवीं सदी के मध्य दक्षिण कौसल की यह राजधानी रह चुका है। 7 वीं सदी में चीनी यात्री व्हेनसांग यहां आया था। यहां छठी सदी में बना ईटों का पहला लक्ष्मण मंदिर है। समीप में राममंदिर है। सोमवंशी राजाओं की वंशावली दर्शाने वाला गंधेश्वर मंदिर राधाकृष्ण मंदिर, चंडीमंदिर, स्वास्तिक मंदिर और कई प्राचीन शिलालेख भी हैं। यहां बौद्घ मठ एवं विहार भी है। शिवरात्रि पर यहां त्रिदिवसीय भव्य मेले का आयोजन भी किया जाता है।

गिरौदपुरी –

बिलासपुर से 80 कि.मी. शिवरीना रामण से 12 कि.मी. दूर स्थित सतनामी समाज का तीर्थ स्थल तथा संतघासीदास जी की जन्म स्थली गिरौदपुरी तपोभूमि है। पहाड़ी पर स्थित चरणकुंड, अमृत कुंड, छाता पहाड़, सुफरा मठ दर्शनीय स्थल हैं।

तुरतुरिया :-

सिरपुर से 15 कि.मी. तथा राजधानी रायपुर से 100 किमी. बहरिया गांव से लगे हुए इस प्राकृतिक धार्मिक पुरातत्व स्थल का अपना अलग ही महत्व है। कहा जाता है कि सीता जी ने यहीं आश्रम में आश्रय पाया था और लव कुश को जन्म दिया। यहां चट्टानों के बीच से निर्झरिणी निकलती है।

शिवरीनारायण :-

बिलासपुर जिले में स्थित यह धार्मिक स्थल वही जगह है, जहां मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी ने शबरी से झूठे बेर खाये थे। यहां दसवीं एवं ग्यारहवीं सदी का कल्चुरी प्राचीन मंदिर है। नारायण एवं चंद्रचुरेश्वर मंदिर दर्शनीय हैं। यहां हर वर्ष एक माह का मेला लगता हैं, जिसमें ओडिशा से लाखों श्रद्घालु पहुंचते हैं।

खरौद:-

यहां आठवीं सदी के सोमवंशी शासकों के दौर के ईटों से बने मंदिरों का अवशेष विद्यमान है। लक्ष्मणेश्वर महादेव के विशाल मंदिर में रामायण से संबंधित दृश्य उनके स्तंभों पर उत्कीर्ण हैं। इन्दलदेउल मंदिर में गंगा यमुना की मानवाकार कलात्मक प्रतिमाएं प्रदर्शित हैं।

मल्हार:-

पुरातात्विक दृष्टि कोण से मल्हार दर्शनीय स्थल है। डेउडी डिंडेश्वरी पातालेश्वर मंदिर चतुर्भुुज विष्णु मूर्ति के अलावा शैव तथा जैन प्रतिमाएं दर्शनीय स्थल हैं। डेउडी डिंडेश्वरी पातालेश्वर मंदिर चतुर्भुत विष्णु मूर्ति के अलावा शैव तथा जैन प्रतिमाएं दर्शनीय हैं।

तालागांव-

बिलासपुर में दक्षिण दिशा की ओर तालागांव में उत्खनन से प्राप्त देवरानी-जेठानी मंदिर के अलावा भगवान शिव की विशाल मूर्ति दर्शनीय है। उत्खनन में कई प्राचीन मूर्तियां भी मिली, जो दर्शनीय है।
– राजेन्द्र मिश्र राज