विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून) विशेष वातावरण सुरक्षा-मानव जाति का श्रेष्ठ कर्तव्य

पर्यावरण (वातावरण) प्रदूषण रोकने में डेरा सच्चा

सौदा का सराहनीय योगदान:-

डेरा सच्चा सौदा विश्वप्रसिद्ध ‘सर्वधर्म संस्थान’ है। यहां पर पूजनीय मौजूदा गुरु संत डा. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां द्वारा मानवता भलाई के लिए 130 सेवाकार्य चलाये जा रहे है। यह कार्य सभी सेवादार पूज्य गुरु जी के पावन आशीर्वाद तथा मार्गदर्शन में श्रद्धा, विश्वास तथा लगन से पूरा करते हैं। इनमें से एक उत्तम कार्य है ‘वातावरण को स्वच्छ बनाना’। इस कार्य को पूज्य गुरु जी ने नाम दिया है ‘हो पृथ्वी साफ, मिट रोग अभिशाप’।

इस भलाई कार्य के अंतर्गत भारतवर्ष की राजधानी दिल्ली से 21-22 सितम्बर 2011 को सफाई महाअभियान का आरम्भ किया गया और इस तरह अब तक देश के 32 अलग-अलग नगरों व महानगरों में ऐसे सफाई महाअभियान चलाए जा चुके हैं।

इसके साथ ही धरा को हरा-भरा करने के लिए डेरा सच्चा सौदा व साध-संगत हर वर्ष लाखों नये पेड़-पौधे लगाते हैं और उनकी देखभाल व अपने बच्चों की तरह उनका पालन-पोषण तथा सरंक्षण करते हैं। इस कार्य में डेरा सच्चा सौदा ने कई विश्व कीर्तिमान भी स्थापित किए हैं।

15 अगस्त 2009 को मात्र एक घंटे में 9 लाख 38 हजार 7 पौधे लगाने के लिए तथा इसी दिन 8 घंटों (यानि एक दिन) में 68 लाख 73 हजार 451 पौधे रोपित करने पर डेरा सच्चा सौदा के नाम एक ही दिन में दो विश्व रिकॉर्ड गिनीज बुक आॅफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज हुए है।

इसके अतिरिक्त 15 अगस्त 2011 को एक घंटे में 19,45,435 पौधे लगाने के लिए भी डेरा सच्चा सौदा का नाम गिनीज बुक आॅफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज है। अब तक डेरा सच्चा सौदा द्वारा 3 करोड़ 63 लाख 31 हजार 75 पौधे लगाए जा चुके हैं।

पेड़-पौधे पृथ्वी के लिए वरदान हैं। पेड़-पौधे रूपी हरे गहने धरती को सजाते हैं, पृथ्वी का शृंगार करते हैं। पूज्य गुरु जी का मानव जगत के हित के लिए पाक-पवित्र संदेश यह भी है कि हर व्यक्ति कम से कम साल में 12, अर्थात् ज्यादा से ज्यादा पौधे लगाए और उनका पालन-पोषण करे, ताकि पृथ्वी और हमारा वातावरण स्वच्छ बन सकें और मानव स्वस्थ रहे।

पूज्य गुरुजी ने दिनांक 24 मार्च 2014 को अस्थियों पर पेड़-पौधे लगाने का आहवान किया जोकि वातावरण सुरक्षा के हित बहुत ही महत्वपूर्ण कदम है। डेरा सच्चा सौदा में अस्थियों पर अब तक हजारों पौधे रोपित किए जा चुके हंै।

 

‘प्रदूषण’ वायु, जल, भूमि और पृथ्वी के भौतिक, रासायनिक तथा जैविक गुणों का दूषित बदलाव है, जिससे मनुष्य जाति के शरीर, कार्यों तथा सभ्यता के अतिरिक्त दूसरे जीवों पर विपरीत प्रभाव डालता है। प्रकृति को मलिन करने वाले पदार्थ को ‘प्रदूषक’ कहा जाता है।

प्रकृति स्वयं लगभग 99.95 प्रतिशत अपनी बनावट पर बुरा बदलाव कर सकती है, जैसे- आंधियां, तूफान, ज्वाला मुखियों का फटना, कच्चे तेल व कोयले की खानों से गैंसों का रिसाव इत्यादि। हालांकि मानव जाति द्वारा लगभग 0.05 प्रतिशत प्रदूषण फैलाया जाता है, परंतु यह प्रदूषण प्राकृतिक मलीनता से अधिक हानिकारक सिद्ध होता है।

वातावरण में कुछ ऐसे दूषित पदार्थ होते हैं, जो समय और परिस्थितियों के अनुसार अपना बुरा प्रभाव कुछ जीवाणुओं की प्रतिक्रिया से भी छोड़ देते हैं, परन्तु कुछ ऐसे प्रदूषक होते हैं, जो समय के साथ-साथ बढ़ते चले जाते हैं।

वातावरण में प्रदूषण बढ़ने के कारण:-

1. प्राकृतिक स्त्रोत-

पेड़-पौधों के फलों से निकले पराग कण, फंगस तथा छोटे जीवाणुओं के स्पोरस, ज्वालामुखी पहाड़ों से निकलने वाली हानिकारक गैसें, कच्छ भूमि (दल-दल) से निकलने वाली हाईड्रोकार्बन, आंधी, तूफान, फसलों के अवशेषों को जलाने एवं जंगलों की आग व सूर्य जैसे कई अन्य ग्रहों से निकलने वाली कई हानिकारक गैसें तथा कास्मिक इत्यादि किरणें भी प्रदूषण फैलाती हैं।

2 मानवप्रजाति द्वारा फैलने वाले प्रदूषण:-

• दिन प्रतिदिन वनों (पेड़-पौधों) को काटा जा रहा है तथा इस प्रकार के और भी कई प्रदूषक पदार्थों के प्रयोग से मानव वातावरण को प्रदूषित किए जा रहा है।

• धातू संशोधन- खनिज पदार्थों को धातू रूप में ढालने से धूल-झाड़, भाप तथा धुएं से निकलने वाले फ्लोराईड, सल्फाईड, सीसा, करोमियम, निक्कल, आरसैनिक, मरकरी इत्यादि वस्तुओं से भी वायु प्रदूषण फैलता है।

• रासायनिक उद्योग- खेतों में रसायनिक खाद: कीड़ों, हानिकारक कीटों व खरपतवार को मारने की दवाईयां (कीटनाशकों), रबर, प्लास्टिक, सीमेंट तथा औजार बनाने से निकलने वाले प्रदूषित उत्पाद कार्बनडाईआॅक्साईड, कार्बन मोनोआॅक्साईड, नाईट्रोजन आॅक्साईड, सल्फरआॅक्साईड, अमोनिया, क्लोरीन इत्यादि गैसें।

• औषधियां तथा सजावट सामग्री बनाने से फैलने वाले मलिन पदार्थ।

• वैल्डिंग: पत्थर रगड़ाई व पीसाई करना, रत्न बनाना।

• मोटर-गाडियां, जैट, हवाई जहाज, कारखानों इत्यादि से निकलने वाला धुआं। यह लगभग 80 प्रतिशत प्रदूषण का कारण हैं।

• खुले में शौच करना प्रदूषण का सबसे बड़ा कारक है।

• सी.एफ.सी. (क्लोरो-फ्लोरो-कार्बन) जैट गैस से निकलती है तथा ग्लोबल वार्मिंग पैदा करती है।

वातावरण प्रदूषण के दुष्प्रभाव:-

मलीनता के बुरे प्रभाव इतने हैं कि इनके हद से अधिक बढ़ जाने से प्रलय तक आ सकती है यानि मानव जाति का अंत हो सकता है। क्योंकि इससे शरीर के सभी अंगों तथा कार्यशैली, जैसे- पाचन क्रिया, सांस लेना, दिल की धड़कन, ज्ञान-इन्द्रियोंं की शक्ति, सोच विचार इत्यादि पर बुरा असर पड़ता है।

खेती बाड़ी व पशुपालन, उद्योग उत्पादन पर दूषित प्रभाव इन्सान से सहन नही हो सकता। पत्तों पर छिद्र (सटोमेटा) कम खुलते हैं पेड़ पौधे तथा लाभकारी जीवाणुओं पर इतना बुरा असर पड़ रहा है कि कई प्रजातियां पृथ्वी से समाप्त होती जा रही हैं और त्वचा व शरीर के कई अंगों में कैंसर के कारण बढ़ते चले जा रहे हैं।

अम्लीय वर्षा- जब कई दिनों बाद बरसात होती है तो पानी की बूंदों में कई गैसें तथा लवण मिल जाने से इसकी पी. एच. 5.3 प्रतिशत से भी कम हो जाती है (शुद्ध पानी की पीएच 7.0 होनी चाहिए)। जिसका वातावरण तथा मानवीय रचनाओं पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। इसलिए बरसात शुरू होने पर पहले 5-10 मिनट तक इस पानी का प्रयोग न करें।

समाग- सर्दी के दिनों में जब औद्योगिक नगरों में कोहरे की स्थिति पैदा हो जाती है तब फैक्ट्रियों तथा गाड़ियों से निकला धुआं वहां के वातावरण में अधिक धुंधलापन पैदा कर देता है जिससे गाडियां चलाने में कठिनाई पैदा होती है तथा सांस लेने में बहुत तकलीफ होती है एवं जुकाम, खांसी, वायरल बुखार, हे-फीवर की संभावनाएं बढ जाती हैं। अस्थमा, फेफड़ों के कैंसर के अतिरिक्त बच्चों के विकास में कमी आ जाती है।

वातावरण बचाव में मानजाति का योगदान:-

• प्रदूषण बढ़ाने के सभी हानिकारक कारकों पर गंभीरतापूर्वक विचार करते हुए इनकी रोकथाम के उचित उपाय सुनिश्चित करने चाहिएं। पृथ्वी को स्वच्छ, उज्जवल तथा विकास-कृत बनाना होगा।

• गाड़ियों का प्रयोग कम किया जाए, बहुत पूरानी गाड़ियों पर प्रतिबन्ध लग जाना चाहिए। डीजल व पैट्रोल के स्थान पर सीएनजी गैस का प्रयोग किया जाए अथवा सुर्य ऊर्जा तथा बैटरी से आधुनिक गाड़ियां चलाई जाएं।

• रसोई घरों में लकड़ी व कायले के स्थान पर प्राकृतिक गैस अथवा वायो गैंस को बढ़ावा देना चाहिए।

• बिजली पैदा करने के लिए थर्मल प्लांट के स्थान पर परमाणु -ऊर्जा, सौर-ऊर्जा तथा पवन -ऊर्जा के स्त्रोत विकसित किए जाएं।

• पेड़-पौधे अथिक लगाए जाएं और उनका सरंक्षण किया जाए।

• जंगलों की आग का बचाव किया जाए।

• खेतों में खरपतवार में कभी आग नहीं लगाएं, बल्कि उससे खाद बनाई जाए।

• खेतों में रासायनिक खाद व कीटनाशक दवाईयों को त्याग कर जीवाणुओं द्वारा तैयार की गई बायो-फर्टीलाईजर व बायो-पैस्टीसाईड का प्रयोग किया जाए।

• मल, मैल पाखाना मलमार्ग (टॉयलेट शीट), तलाब, नहरों, झीलों, नदियों की नियमित ढंग से सफाई पर पूरा ध्यान दिया जाए।

• फैक्ट्रियों में ऊंची चिमनियां होनी चाहिए, इनमें छानने के उपक्रम, जमाव तथा तलछटीय स्थितियां लगवाई जाएं, ताकि सुक्ष्मकण तथा गैसें निकलने के आसार कम किये जा सकें।

• सरकार द्वारा सभी प्रकार के औद्योगिक संस्थानों का समयानुसार परीक्षण करवाया जाए ताकि प्रदूषण पर नियंत्रण रहे।

• ‘इलाज से परहेज अच्छा है।’ मलीनता रोकने से ही कई प्रकार की बीमारियों से बचाव संभव है।

-डॉ. त्रिलोकी नाथ चुघ ‘इन्सां’
पूर्व को-आॅर्डिनेटर शाह सतनाम जी शिक्षण संस्थान, डेरा सच्चा सौदा, सिरसा (हरियाणा, भारत)