वैराग्यमयी आवाज के लिए ही चर्चित है पपीहा

कोयल की तरह ही अपनी विशिष्ट आवाज के लिए चर्चित एक और पक्षी है जिसे ‘पपीहा’ कहते हैं। यह पक्षी कबूतर के आकार का होता है, लेकिन होता है कुछ दुबला-पतला। इसकी दुम लम्बी होती है। इसका रंग ऊपर से ग्रे तथा नीचे से सफेद होता है, जिस पर भूरी-भूरी धारियां पड़ी होती हैं।

इसकी दुम भी धारीदार होती है। इस पक्षी के नर और मादा में कोई विशेष अंतर नहीं होता है। यह भी भारत में सभी जगह पाया जाता है और गर्मी के शुरू होते ही इसकी आवाज सुनाई पड़ती है। हिन्दी साहित्य और रूहानियत व सूफियत में कोयल की तरह पपीहे का बहुत भी उल्लेख आता है। कहते हैं यह एक विशेष नक्षत्र में बरसने वाला पानी ही पीता है। इसीलिए कहता है ‘पी-कहां’।

कवियों ने इसका अर्थ लगाया कि यह अपने प्रियतम को बुलाता है और कहता है कि ‘पी-कहां’ अर्थात् मेरा प्रियतम कहां है। मराठी में इसे ‘पाओस-आला’ अर्थात् पानी बरसने वाला है। इसकी आवाज शुरू में धीमी और बाद में तेज हो जाती है और फिर कुछ देर के लिए बिल्कुल बंद हो जाती है।

पपीहा भी कोयल की तरह धोखा देने में दक्ष होता है। बताते हैं कि यह अपना अण्डा बैब्लर पक्षी के घौंसले में देकर आती है और उसे भ्रम न हो, तो उसका एक अण्डा निकाल लाती है।

इन बातों में कितनी सच्चाई है यह तो नहीं कह सकते लेकिन अभी तक सुनते यही आए हैं! है न ये विचित्र पक्षी!
-अशोक त्रिपाठी

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