बेटों की भी होती है विदाई… : यह एक कटु सत्य है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज ही उसका आधार है। बिना समाज के रहने की तो आम आदमी सोच भी नहीं सकता।

समाज का आधार परिवार है और परिवार का आधार विवाह है। विवाह के बिना हम परिवार की कल्पना ही नहीं कर सकते। विवाह एक ऐसी व्यवस्था है जो एक स्त्री और पुरुष को जीवन भर के लिये एक दूसरे से बाँध देती है। उनका सब कुछ सांझा हो जाता है।

विवाह के बाद लड़की को अधिकाँश माँ-बाप यह कह कर विदा करते हैं कि अब ससुराल ही उसका घर है।
हमारी संस्कृति ही ऐसी है कि जब एक कन्या का जन्म होता है तो उसी दिन से माता-पिता सोच लेते हैं कि वो एक पराई अमानत है और एक दिन इसे घर से विदा करना है। आज भी ज्यादातर मामलों में एक लड़की का पालन-पोषण भी इसी नजरिये से किया जाता है। हालांकि हाल के वर्षों में इस सोच में बेशक थोड़ा-बहुत परिवर्तन आया है।

अब लोग बेटियों को अहमियत देने लगे हैं और चाहते हैं कि वे भी पढ़-लिखकर कुछ काबिल बनें और आत्मनिर्भर बनें।
पहले तो विवाह दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का मिलन कहा जाता था, लेकिन इस धारणा में भी अब परिवर्तन आया है। क्योंकि अब एकल परिवारों का युग शुरू हो गया है। एक लड़के के माँ-बाप बड़े उल्लास और उमंग के साथ नई दुल्हन को विदा कराके अपने घर ले जाते हैं।

काफी दिनों तक घर में चारों तरफ खुशियाँ फैली रहती हैं परन्तु धीरे-धीरे घर में तनाव छाने लगता है और धीरे-धीरे यह तनाव झगड़े और क्लेश का रूप ले लेता है। घर में पति-पत्नी, सास-बहू, देवर-भाभी और ननद-भाभी के झगड़े शुरू हो जाते हैं और कई बार ऐसी नौबत आ जाती है कि परिवार बिखर जाता है।

क्या कारण है कि जो परिवार बड़े चाव से एक पराई लड़की को बहू बनाकर लाता है, उन्हें वो दुश्मन लगने लगती है। जो बेटा आँखों का तारा था, अब वो फूटी आँख नहीं सुहाता? जिस बेटे का सारा संसार उसके माँ-बाप और बहन-भाई थे, अब वही उसे चुभने लगते हैं? एक लड़की जिसने एक पराये घर को अपना समझ कर बड़ी उमंग के साथ कदम रखा था, अब वो उसे जल्द से जल्द छोड़ देना चाहती है? कारण ढूंढने की कोशिश भी कीजिए।

हमें यह जुमले सुनने को मिलते हैं कि बहू ने हमारा बेटा छीन लिया या हमारा बेटा अब हमारा नहीं रहा। मैं यह मानती हूँ कि 99 प्रतिशत लड़कियाँ ससुराल को अपना घर मानकर ही ससुराल में कदम रखती हैं और 99 प्रतिशत माता-पिता एक लड़की को अपना मानकर खुशी-खुशी घर लाते हैं, तो फिर क्या कारण है कि सब एक दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं?
इस समस्या की वजह है ‘हमारी पुरानी और गलत सोच तथा बदलती दुनिया के साथ सामंजस्य स्थापित न कर पाना।’ आज संसार बहुत बदल चुका है। पिछले तीन-चार दशकों में युवा पीढ़ी में बहुत बदलाव आ चुका है।

अब समझदारी इसमें है कि आप वक्त के साथ चलें, नहीं तो आपका वक्त खराब हो सकता है। हमारा सोचना है कि शादी के बाद एक लड़की अपना मायका छोड़कर एक नये घर में प्रवेश करती है और उसकी सारी दुनिया बदल जाती है, परन्तु सच्चाई यह है कि केवल लड़की ही नहीं, लड़का भी अपना परिवार छोड़कर एक नया परिवार बसाता है और उसका भी सारा संसार बदल जाता है।

हम इस सच्चाई से इसलिए अनजान बने रहते है क्योंकि लड़का घर में ही रहता है। उसे लड़की की तरह अपना घर छोड़ना नहीं पड़ता। शादी के बाद एक लड़की की तरह उसकी भी एक नई जिन्दगी शुरू होती है। कहने को तो वर-पक्ष के परिवार में बढ़ोत्तरी होती है पर वास्तविकता यह है कि वधू-पक्ष की तरह ही वर-पक्ष का परिवार भी छोटा हो जाता है क्योंकि शादी के बाद परिवार में ही एक नये परिवार का जन्म होता है। यह अलग बात है कि यह परिवार उस समय हमें नजर नहीं आता। शायद इसी कारणवश बेटे-बहू वाले घर को संयुक्त परिवार कहा जाता है।

शादी के बाद एक लड़के की जिन्दगी भी बदल जाती है, पर यह बदलाव उसके घर वालों को सहन नहीं होता। बच्चे होने के बाद तो यह बदलाव और बड़ा हो जाता है। अब वह अपने और अपने परिवार के बारे में सोचने लगता है और परिवार में झगड़े बढ़ने लगते हैं। यही कारण है कि आज संयुक्त परिवार टूट रहे हैं और हम सब एक दूसरे को दोष दे रहे हैं।
इस समस्या से निपटने का यही एकमात्र उपाय है कि हम एक दूसरे पर दोषारोपण करने की बजाये अपने गिरेबान में झाँकें और देखें कि हमसे कहाँ गलती हो रही है। जब तक हम मर्ज को नहीं पहचानेंगे, तो उसका इलाज भी नहीं कर सकते।

हमें लड़कियों को विदा करना अच्छे से आता है परन्तु हमें लड़के को विदा करना भी सीखना पड़ेगा। शादी के बाद बेटे की जिन्दगी में होने वाले बदलावों को ध्यान में रखकर माँ-बाप को अपनी जिन्दगी में भी बदलाव लाने होंगे और बेटों को भी अपने परिवार की भावनाओं का ख्याल रखना पड़ेगा।

अगर हम चाहते हैं कि हमारे समाज में पारिवारिक तनाव और झगड़े कम हों, तो सही या गलत की बहस में पड़ने की बजाये युवा पीढ़ी की सोच के साथ सामंजस्य बैठाकर चलना पड़ेगा। अगर हमें अपने परिवारों को टूटने से बचाना है तो अपने बच्चों को कोसने की बजाये उनकी भावनाओं को समझना होगा। अगर हम चाहते है कि अपने माँ-बाप और भाई-बन्धु छोड़कर हमारे घर आयी लड़की हमें अपने माँ-बाप और भाई-बन्धुओं की तरह इज्जत और प्यार करें, तो हमें भी उसे ‘बेटी’ वाला प्यार देना होगा।

आजकल तो बेटियों से पहले ही बेटे घर से विदा हो जाते हैं! पहले पढ़ाई के लिये और फिर नौकरी के लिये उन्हें अक्सर अपना घर छोड़कर एक पराये शहर में अलग संसार बसाना होता है। हम यह तो जानते हैं कि बहुत थोड़े से मामलों को छोड़कर कोई माँ-बाप अपने बच्चों का बुरा नहीं चाहते और बच्चे भी अपने माँ-बाप के बारे में बुरा नहीं सोच सकते। सारा खेल आपसी समझ-बूझ की कमी का है। भारतीय संस्कारों पर भरोसा करके अगर हम आपसी समझ-बूझ बढ़ाएं तो काफी हद तक पारिवारिक समस्याएं खत्म की जा सकती हैं। – सीमा पासी

परिवार को खुश देखकर ही खुश है नारी
बचपन से ही हमारे देश में लड़कियों को त्याग करने की सीख मिलनी शुरू हो जाती है। बहन से ज्यादा भाई का ख्याल रखा जाता है। बहन को अपने भाई के लिए क्या क्या नहीें करना पड़ता। अक्सर बहन यह सोचती है कि वह क्या दूध-दही पीये, वह क्या साग-सब्जी खाए। वह और नमक खाकर भी बड़ी हो जायेगी। सब कुछ भाई को खाना चाहिए, क्योंकि उसे ही तो बलवान बनना है।

भाई को नये जूते, नये कपड़े चाहिए क्योंकि वह सबकी आंखों का तारा है। अपने भाई और पिता को पहले खाना परोसकर देती है, चाहे बाद में कुछ बचे या नहीं। बचपन से ऐसी सीख मिलती है जो जीवन-भर उसका पीछा नहीं छोड़ती।
यह त्याग ही तो है जो उसे अपने बाबुल का घर छोड़कर पिया के घर जाना पड़ता है। यह उसके त्याग का ही हिस्सा है जो वह ससुराल जाकर ससुराल को ही प्राथमिकता देती है। अपने मायके को उसे भूलना पड़ता है। अपने मायके आने के लिए उसे कई तरह से सोचना पड़ता है। सबकी आज्ञा लेनी पड़ती है नहीं तो अपने घर आने के लिए किससे पूछना? किंतु अब तो ससुरालवालों की खुशी ही उसकी खुशी हो जाती है।

अपने पति के साथ हर हाल में खुश रहना, जिसका वे कहें उसका आदर – सम्मान करना, जो वे कहें उतनी ही करना, जैसा वे पहनायें, जैसा वे खिलायें और जैसा वे बनायें, वैसा ही बनकर रहना। क्या यह सब उसके त्याग में सम्मिलित नहीं होता? कहने का तात्पर्य यह है कि पति की खुशी में ही खुश रहना, वे जिसकी सुनने को कहें, उसकी सुनना, जिससे न मिलने को कहें, उससे दूर रहना, क्या कुछ नहीं करती हमारी भारतीय नारी? शायद ऐसी ही कुछ परिस्थितियां आपके साथ भी मिलती-जुलती होंगी।

परिवार के लिए अपनी नींद और चैन गंवाना तो उनके लिए मामूली बात है। पति देर रात तक घर नहीं आयें तो न खाना खाएंगी, न सोएंगी। सारी रात नन्हें बेटे को बुखार रहा, तो एक पल के लिए भी आंख नहीं झपकाएंगी। जवान बेटी को ट्यूशन से आने में देर हो गई तो अपनी ब्लड-प्रेशर की गोली लेना ही भूल गई। क्या कुछ नहीं करती ये महिलाएं?
सास कहती है कि बेटा ही चाहिए तो बार-बार जिंदगी और मौत से कौन जूझती हैं? पूरे परिवार को खाना खिलाने के बाद भूखी कौन रह जाती है? पति के लिए व्रत, बेटे के लिए व्रत कौन करती है? अब तो कुछ बयान करने की जरूरत ही नहीं कि त्याग और बलिदान की मूर्ति कौन है?

दरअसल महिलाएं किसी भी स्थिति में खुद को बहुत जल्दी ढाल लेती हैं। विपरीत परिस्थितियों से निकलने का सकारात्मक उपाय भी जल्दी ही ढूंढ लेती हैं किंतु यह भी सच है कि हर कदम पर उन्हें अधिक संघर्ष करना पड़ता है। परिवार के लोगों की खुशी के लिए उन्हें अपनी खुशी को दांव पर लगाना पड़ता है।
फिर भी वे उनकी खुशी में ही अपने लिए भी जगह तलाश कर लेती है। उन्हें यह अहसास भी नहीं होने देती कि वे खुश नहीं हैं। उनमें त्याग और समर्पण की अद्भुुत क्षमता होती है। अपने परिवार की खुशियां यदि उनका लक्ष्य है तो वे इसके लिए अपने व्यक्तित्व को भी दांव पर लगा देती हैं।

कौन समझेगा इनके स्वभाव को? कौन जानेगा इनकी मनोस्थिति? भले ही कोई महिला कितनी ही आत्मनिर्भर क्यों न हो, किंतु उसे भी अपना पक्ष विकसित करने के लिए कितना संघर्ष करना पड़ता है? उसे भी कई त्याग करने पड़ते हैं, किंतु उसकी कुरबानियों को अनदेखा कर दिया जाता है। इसे उसकी जिम्मेदारी कहा जाता है अर्थात् अपने परिवार के लिए यदि वह कोई त्याग करती है तो उसे कोई बड़ा काम नहीं माना जाता।

न जाने हमारे समाज की चिंतन शक्ति में कब बदलाव आयेगा! कब नारी के त्याग एवं बलिदान को गौरान्वित किया जायेगा। कब उन्हें इसके लिए सम्मान मिलेगा? फिलहाल तो यह सच है कि वे अपनी परिवार की खुशी में ही खुश हैं और ऐसे ही परिवार के साथ खुश रहना पसंद करती हैं।
– शिखा चौधरी