बेटा, नाम तो तेरे पास है, उसका जाप करना है:

सत्संगियों के अनुभव पूज्य गुरु डॉ. एमएसजी के रहमो-करम का कमाल…

प्रेमी आनंद स्वरूप इन्सां सुपुत्र श्री वेदराम शर्मा गांव अहमदानगर ब्लॉक अगौता जिला बुलंदशहर (यूपी)।

अपने सतगुरु मुर्शिद प्यारे हजूर परम पिता जी के अपार रहमो-करम की अति प्रिय घटना प्रेमी जी लिखित में इस प्रकार बताते हैं।

वर्णनीय है, वर्ष 1982 में पूजनीय परम पिता जी उत्तर प्रदेश के जिला बुलंदशहर के आस-पास के कई गांवों-शहरों में सत्संग कार्यक्रमों (जीवोद्धार के उद्देश्य) के लिए पधारे।

हमारे इस ग्रामीण इलाके में जो कि आर्थिक रूप से भी उन दिनों बहुत पिछड़ा हुआ था, पूज्य सतगुरु परम पिता जी द्वारा सत्संग लगाना, लोगों को राम नाम से जोड़कर उन्हें शराब मांस आदि बुराइयों से मुक्त करना पूज्य सतगुरु जी का बहुत बड़ा उपकार है। उसी दौरान मैंने भी एक सत्संग पर पूज्य परम पिता जी से नाम-शब्द (गुरुमंत्र) प्राप्त कर लिया था।

लेकिन सच्ची बात तो यह है कि नाम-शब्द लेने की मेरी दिली इच्छा बिल्कुल भी नहीं थी यानी दूसरे लोगों के देखा-देखी मैं भी नाम (गुरुमंत्र) लेने वालों में जाकर बैठ गया था।

सालों के साल गुजर गए न तो पूज्य परम पिता जी दोबारा फिर कभी हमारे इलाके गांवों में सत्संग करने पधारे और न ही मैं तथा मेरे गांव से शायद कोई जीव सत्संग सुनने के लिए डेरा सच्चा सौदा सरसा या कभी बरनावा (शायद ही कोई) गया हो, जहां तक मुझे जानकारी है।

परंतु यह तो पक्का है कि मैं कभी नहीं गया था। नाम-शब्द तो मिल गया था, मानो एक तरह से अलमारी में उसे लॉक करके रख दिया था।

महापुरुषों का कथन सौ फीसदी सच है कि पूरे सतगुरु का नाम (नाम रूपी बीज) कभी भी बेकार नहीं जाता। चाहे जमीन कितनी भी बंजर या कलर मारी (शोरे वाली) भी क्यों न हो, समय आने पर जब भी कभी सुखद वातावरण से वो जीव गुजरता है, नाम का बीज अवश्य अंकुरित हो उठता है। वर्ष 1994 (यानि 12 वर्ष बीत गए थे) आ गया।

सतगुरु प्यारे के सच्चे नाम की लगन ने दिल में हल्की सी एक तड़प को जागृत किया। उन दिनों पूजनीय मौजूदा गुरु जी संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां (पूज्य डॉ. एमएसजी लायन हार्ट पिता जी) शाह सतनाम जी आश्रम (डेरा सच्चा सौदा) बरनावा (यूपी) में पधारे थे।

पूज्य पिता जी की मेहर से मुझे भी उस दिन आश्रम बरनावा में जाने का सौभाग्य मिला। मैंने पूज्य गुरु जी से नाम-गुरुमंत्र लेने की इच्छा व्यक्त करते हुए विनती की, इस पर अंतर्यामी पिता जी ने तुरंत वचन फरमाया, ‘‘बेटा, नाम (गुरुमंत्र) तो तेरे पास है। उसका जाप करना है।’’

सतगुरु जी की रहमत से मैंने उसी दिन से, नियमित रूप से और पूरी लगन व तड़प के साथ सुमिरन करने का (निश्चित समयानुसार) रूटीन बना लिया।

पूज्य सतगुरु जी की दया से सपने व ख्यालों आदि में पूज्य शहनशाह जी से मेरी बात भी होने लगी थी।

स्वयं पूज्य शहनशाह जी सत्संग में तथा दुनियावी कार्यों में भी मुझे दिशा-निर्देश उसी दिन से देने लगे थे।

उन्हीं दिनों पूज्य हजूर पिता जी ने जब ब्लॉकों का गठन किया (पहली बार) साध-संगत का आपसी मेल-जोल व सुविधा के लिए, मालिक की दया से साध-संगत ने मुझे हमारे गांव का भंगीदास बना दिया और यह सेवा, मालिक की दया से, मैं आज भी कर रहा हूं।

एक दिन मैं अपने दरबार के पवित्र ग्रन्थ में प्रकाशित सत्संगियों के अनुभव नामचर्चा में पढ़कर सुना रहा था, जिसमें लिखा है कि पूज्य गुरु जी ने एक सत्संगी प्रेमी की सच्ची तड़प को देखते हुए उसे अपने प्रत्यक्ष दर्शन दिए। करिश्मा पढ़ के मेरे भी अंतर-हृदय में दर्शनों की तड़प जागी कि सतगुरु जी के दर्शन ऐसे कैसे हो जाते है, मुझे भी कोशिश करनी चाहिए कि गुरु जी, मुझे भी प्रत्यक्ष अपने दर्शन दिखाएं।

रोजाना अभ्यास के अनुसार उस रात जैसे ही प्रात: 3:30 से 4:00 बजे तक ब्रह्ममुहूर्त (अमृतवेला) मैं सुमिरन करकेअपनी चारपाई पर लेटा, पूज्य शहनशाह पिता जी ने मुझे बिल्कुल जागृत अवस्था में अपने प्रत्यक्ष दर्शन-दीदार दिए। बल्कि सच्चे पातशाह जी ने अपने पवित्र मुख से यह भी फरमाया कि ‘बोल बेटा, प्रत्यक्ष दर्शन हो रहे हैं।’ मैं चुप रहा। मैं सतगुरु जी के नूरानी स्वरूप को ही निहारता रहा।

अगले पल पूज्य शहनशाह पिता जी ने अपने पवित्र कर-कमलों से मेरी बाजू (बांह) को पकड़ा और हलूणा-सा देके (मुझे थोड़ा हिलाकर) फरमाया, बोल बेटा, प्रत्यक्ष दर्शन हो रहे हैं या नहीं।

मैंने प्यारे मुर्शिद जी की पूरी पावन बाडी को (पवित्र चरण-कमलों से ऊपर तक) बहुत श्रद्धा से निहारा। पवित्र बाडी के नूरी प्रकाश को निहार के मेरा तन मन खिल गया। बहुत अच्छा लगा। बड़ी खुशी मिली। जी हां, पिता जी,

आप जी का रहमो-करम आप जी के नूरे जलाल को तक्क कर मेरा रोम-रोम नशेआ रहा है। पिता जी आप जी का कोटि-कोटि धन्यवाद।

लख-लख सजदा करते है प्यारे मुर्शिद जी।

अपनी खुली आंखों से मुर्शिद प्यारे के प्रत्यक्ष दर्शन दीदार पाके मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा था। ए मेरे मुर्शिद प्यारे पिता जी, आप जी के पवित्र दीद का यह नजारा हमेशा ज्यों का त्यों बना रहे जी।