… बेटा, घबराना नहीं, हम तेरे साथ हैं :- पूज्य हजूर पिता डॉ. एमएसजी की रहमत

प्रेमी जगदीश राय इन्सां सुपुत्र सचखंडवासी श्री शाम लाल मानसा शहर, जिला मानसा (पंजाब) से सतगुरु की रहमत का वर्णन करते हैं।

दिनांक 14 अगस्त 1997 को मैं परम पूजनीय हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां के दर्शन करने के लिए डेरा सच्चा सौदा शाह सतनाम जी धाम सरसा पहुंचा। उस रात मैंने आश्रम में ही आराम किया। उस रात जब मैं अर्द्ध जागृत अवस्था में लेटा हुआ था, तो मुझे हजूर पिता जी ने दर्शन दिए।

उस समय हजूर पिता जी शाही स्टेज पर विराजमान थे। मेंने पिता जी के चरणा में अर्ज की कि पिता जी, मैंने मकान बनाने के लिए प्लाट लिया है। पिता जी ने वचन फरमाए, कि बेटा बहुत खुशी की बात है, परन्तु 02-09-97 को तेरे पर कष्ट आएगा, घबराना नहीं, हम तेरे साथ हैं।

अगले दिन 15 अगस्त को मैं पिता जी के दर्शन करके अपने घर मानसा लौट आया। मैंने अपने पापा जी को रात वाली सारी बात बताई। वह कहने लगे कि सरसे हजूर पिता जी से बात करके देख लो। उसके बाद पिता जी से कोई बात नहीं हो सकी।

दिनांक 2 सितम्बर 1997 को सुबह दो बजे अंधेरी आई। मैं उठा तो मेरा ध्यान मेरे बड़े लड़के में गया। वह छटपटा रहा था। लड़के की एक साइड बिल्कुल रुक गई थी। हम लड़के को लेकर डॉक्टर के पास जा रहे थे तो रास्ते में उसकी दूसरी साइड भी रुक गई। उसका सिर नीचे लटक गया।

मैंने अपने भाई को कहा कि यह तो खत्म है, अपने वापिस चलते हैं। वह कहने लगा कि पहले डॉक्टर के पास चलते हैं। मरीज को देखकर डॉक्टर ने ना में सिर हिलाया। हमारे विनती करने पर डॉक्टर ने टीका आदि लगा दिया। टीके का तो बहाना था, सतगुरु ने तो पहले ही बता दिया था कि कष्ट आएगा घबराना नहीं।

सुबह तक लड़का बिल्कुल ठीक हो गया। अगले दिन मैं लड़के को लेकर सरसा दरबार में गया। वहां ड्यूटि वाले सेवादारों से कहकर मैं पूज्य पिता जी से मिला। उस समय पिता जी तेरावास में सेवादारों को खुशियां लुटा रहे थे। बारी आने पर मैं लड़के को लेकर खड़ा हो गया, पिता जी को सारी बात बताई। पूज्य पिता जी सच्चे सतगुरु जी ने वचन किए कि ‘बेटा, 2-4 डॉक्टरों की राय ले लेना और बच्चे को नाम दिला देना, मालिक साथ है।

और जैसा कि पूज्य पिता जी ने वचन किए थे हमने सत् वचन कह कर वचनों पर फूल चढ़ाए उस दिन से वह बच्चा कभी भी बीमार नहीं हुआ।

सतगुरु जी ने रहमत करके बच्चे का वह जो कोई भयानक कर्म था, उसे सूली से सूल बना दिया। मैं अपने सतगुरु के उपकारों का बदला किसी तरह से भी नहीं चुका सकता। मालिक तू धन्य-धन्य है। बस, धन्य-धन्य ही कर सकता हूं।