जरूरी है जिद्द भी : कुछ लोग बहुत जिद्दी होते हैं। क्या जिद्दी अथवा हठी होना एक बुरी आदत है? वस्तुत: अच्छी या बुरी आदत नहीं होती, बल्कि उनका परिणाम अच्छा या बुरा होता है। यदि किसी क्रिया, प्रतिक्रिया या आदत का परिणाम अच्छा है तो उसकी उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता।

अब जिद्द को ही लीजिए। कुछ लोग अपने झूठे अहंकार की पुष्टि के लिए जिद्दी बन जाते हैं, तो कुछ अपनी कमियों को छुपाने के लिए। दूसरी ओर कुछ लोग जिद्दी तो हैं पर वे लोग गÞलत जिद्द करने की बजाय गलत चीज या विचार के प्रति जिद्दी होते हैं।

इस प्रकार के जिन लोगों को हम प्राय:

जिद्दी कहकर संबोधित करते हैं, वे जिद्दी नहीं अपितु कुछ सिद्धांतों पर चलने वाले, अनुशासनप्रिय, स्वाभिमानी, ईमानदार, दिखावा न करने वाले तथा समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने वाले होते हैं। इस प्रकार जिद्द के दो रूप हमारे सामने हैं।

एक है ‘नकारात्मक जिद्द’ तथा दूसरी है ‘सकारात्मक जिद्द’। नकारात्मक जिद्द जहाँ व्यक्ति और समाज दोनों के लिए घातक है वहीं सकारात्मक जिद्द सबके लिए उपयोगी है।

लोकमान्य तिलक भी बहुत जिद्दी थे। उन्होंने कहा, ‘स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और इसे मैं लेकर ही रहूँगा।’ वे अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे, अंग्रेज सरकार की गलत नीतियों और शोषण के लिए वे उनकी आलोचना करते रहे। अनेक बार जेल गए पर अपनी जिद्द नहीं छोड़ी। गाँधी जी भी कम जिद्दी नहीं थे। ऐसी जिद्द ने दुनिया की सबसे ताकÞतवर हुकूमत को घुटने टेकने के लिए विवश कर दिया।

स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए पूरा राष्ट ही तो जिद्दी हो गया था। लोग इतने जिद्दी हो गए थे कि आजादी पाने के लिए ख़ुद को मिटा डाला। क्या उनके इस योगदान या उनकी इस जिद्द को साधारण जिद्द कहेंगे? कुछ ऐसे जिद्दी भी थे कि हिंसा के जवाब में भी हिंसा नहीं की। वे अहिंसा और सत्य के प्रति आग्रही थे। जीवन मूल्यों के प्रति जिद्द भी कहीं गÞलत हो सकती है? कहाँ मुसोलिनी और हिटलर की जिद्द और कहाँ तिलक, गाँधी और सुभाष की जिद्द!

हर स्वीकारोक्ति अथवा आॅटो सजेशन एक जिद्द ही तो है लेकिन एक उपयोगी तथा सकारात्मक जिद्द। मुसोलिनी अथवा हिटलर की तरह नहीं अपितु तिलक, गाँधी और सुभाष की तरह जिद्दी बनने का प्रयास कीजिए। सकारात्मक स्वीकारोक्ति अथवा प्रतिज्ञापन या उपयोगी जिद्द ही मनुष्य का रूपांतरण करने में सक्षम है।
– सीताराम गुप्ता