राष्ट्रीय  पक्षी मोर के नृत्य में छिपे हैं कई भाव :

मयूर को हमारे देश में राष्ट्रीय सम्मान तथा संरक्षण प्राप्त है। वह अपने अनुपम सौंदर्य तथा मोहक नृत्य के कारण सदियों से मानव को आकर्षित करता रहा है।

मोर हमारे यहां का सबसे सुन्दर पक्षी माना जाता है जैसी राजसी पोशाक इसको प्रकृति ने दी है, वैसी साज-सज्जा किसी भी पक्षी को नहीं मिली है। अपनी नीली मखमल जैसी गर्दन और लंबी सतरंगी दुम से मोर बाग-बगीचों की शोभा को दुगुनी कर देता है। बरसात में जब यह अपनी दुम को गोलाकार फैलाकर नाचने लगता है तो इसकी शोभा देखते ही बनती है।

इसमें दो-राय नहीं कि मयूर भारत का सर्वाधिक सुन्दर पक्षी है। संभवत: इसी से प्रेरित होकर प्रकृति ने मयूर को पक्षी-सम्राट घोषित करने के लिए इसके सिर पर कलंगी-रूपी मुकुट सुशोभित कर दिया है।

मोर भारत देश का पक्षी है जो यहां के सिवा और किसी देश में नहीं पाया जाता। जहां यह पूरे देश के मैदानी भागों पाया जाता है वहीं हिमालय पर भी यह पांच हजार फुट तक चला जाता है। इसके नर और मादा एक रंग-रूप के नहीं होते। नर जितना ही सुन्दर और भड़कीला होता है, मादा उतनी ही भद्दी और बदरंग होती है। नर मादा से कद में कुछ बड़ा होता है मोर नर की लंबाई बिना दुम के जहां 40-48 इंच की होती है, वहीं मादा की लम्बाई 38 इंच से अधिक नहीं होती।

अपनी श्वेत चोंच और नीली हरी गर्दन उठाये अभिमान से इतराते हुए उसका चलना, सुरमई लम्बे-लम्बे परों को क्षत्रक की भांति फैलाकर मस्ती से झूमना और बरखा की झीनी-झीनी फुहारों तले उन्माद में भीगकर नृत्य करना, भला किसे नहीं भाता होगा। यही कारण है कि प्रत्येक भाषा के सौंदर्य प्रवण साहित्य में मयूर को यथेष्ट स्थान दिया गया है। मयूर मात्र तन से नहीं, मन से भी सुन्दर पक्षी है। मयूर मनुष्य के प्रति मैत्रीभाव रखता है। यह उत्तर-भारत के वनों में तथा बस्तियों के समीप पाया जाता है। अन्य पक्षियों की भांति इसे पालतू भी बनाया जा सकता है।

मयूर विकसित तथा लंबे परों वाला पक्षी जरूर है, लेकिन यह अधिक से अधिक वृक्षों की ऊंचाई तक उड़ सकता है। इसकी आवाज काफी तीव्र होती है। मयूर अपने बच्चों के लिये घोंसलों का निर्माण नहीं करता! मयूरी एक बार में दो से अधिक अंडे नहीं देती। इसके अंडे बादामी रंग के होते हैं। मयूर का प्रजनन-काल श्रावण-भाद्र मास है। मयूर शाकाहारी-मांसाहारी (सर्वाहारी) पक्षी है। इसका रक्त इतना उष्ण होता है कि विषैले सर्पों को भी आसानी से पचा जाता है।

मोर क्यों नाचता है?

मोर का नाच केवल प्रणय-क्रीड़ा नहीं है। नि:संदेह, प्रणय-नृत्य उसका मुख्य नृत्य है, किन्तु उसके अलावा भी वह कई उद्देश्यों या कारणों से भी नाचता है।

प्रणय नृत्य

यह मोर के प्रणय नृत्य का समय होता है। इस नृत्य में पहले वह गर्दन ऐंठकर झटके से पूंछ के पंखों को फैलाकर छत्र बना लेता है और मतवाली भंगिमा में उस नयनाभिराम छत्र का प्रदर्शन करता है। धीरे-धीरे वह पंखों को थरथराता है और मादा का ध्यान आकर्षित करने की चेष्टा करता है। जब पास पहुंच जाता है तो तिरछी चाल से पंखों का अपने साथी से स्पर्श कराता है। नृत्य के दौरान वह पांच से आठ मीटर के व्यासार्ध में किसी दूसरे मोर को नहीं आने देता। आने वाला दूसरा मोर अगर कमजोर या बराबरी वाला हो तो वह आक्रमण-भाव प्रदर्शित करके उसे भगा देता है, अगर दूसरा मोर अधिक शक्तिशाली है, तो वह अपना नाच बंद करके उसे रास्ता दे देता है।

अहंभाव प्रदर्शन नृत्य

अहंभाव जताने के लिये नृत्य का उपयोग मोर की एक खासियत है। दूसरे मोर या कबूतर, गिलहरी आदि किसी अन्य पक्षी या पशु को अपने भोजन या विश्राम-स्थल के बहुत नजदीक पाकर वह अहंभाव या विरोध दिखाने के लिये नाचने लगता है। यों तो यह भी प्रणय नृत्य ही प्रतीत होता है। किन्तु इसमें मोहक अदाओं का अभाव होता है और नाराजगी का भाव ज्यादा होता है। प्रतिद्वंद्वी अगर उसका लोहा मानकर हट नहीं जाता तो नृत्य की रफ्तार बढ़ती जाती है। अल्पवयस्क मोर जरा-जरा सी बात पर अपनी मां व भाई-बहनों के विरुद्ध भी ऐसा प्रदर्शन कर बैठते हैं।

आक्रमण नृत्य

अपनी नृत्य-सीमा या भोजन-सीमा में किसी दूसरे मोर, या किसी छोटे पक्षी या जन्तु को पाकर वह क्रोध में आकर उसे वहां से भगाने के लिए नृत्य द्वारा आक्रमण की तत्परता प्रदर्शित करता है। इसमें वह पंखों को तेजी से थरथराता है और खुली चोंच के साथ आगे बढ़कर प्रहार का दिखावा करता है।

ऋतु तरंग-नृत्य

जून से अगस्त तक का समय मोर के प्रजनन की मुख्य ऋतु है। उन दिनों प्रात:काल और संध्याकाल में मोर नृत्य आरम्भ कर देता है। वह इस नृत्य को धीमे-धीमे और कम तत्परता से चलता है, इसीलिए यह नृत्य काफी देर तक भी चल सकता है।

एक मोर को नाचते देख दूसरे समीपस्थ मोर भी साथ देने के भाव से उसके साथ नाचने लगते हैंं। साहचर्य भाव में नृत्य शिथिल और धीमी गति से होता है परन्तु परिस्थिति के अनुसार यह प्रणय, आक्रमण या अहंभाव के प्रदर्शन में भी परिणत हो सकता है।

भय नृत्य

अक्स्मात् सिर पर आ धमके शत्रु से बचाव का कोई रास्ता न दिखाई देता हो तब मोर पूंछ के पंखों का छत्र ऊंचा करके जोरदार आक्रमण की मुद्रा बनाकर नाचने लगता है।

शत्रु उनकी भयावह मुद्रा देखकर डर जाता है और हमला नहीं कर पाता। इन क्षणों का लाभ उठाकर मोर वहां से भागकर बच निकलता है। इस प्रकार का नृत्य मोरनी भी करती है।
– (हिफी)