सेवा के साथ सुमिरन करो, सोने पे सुहागा :

रूहानी सत्संग (3 जुलाई 2016)  डेरा सच्चा सौदा शाह सतनाम जी धाम, सरसा
मालिक की प्यारी साध-संगत जीओ! इस कलयुग में दृढ़ यकीन, श्रद्धा-भावना अपने आप में बहुत बड़ी भक्ति है और साथ में सेवा-सुमिरन करो, तो सोने पे सुहागा है। मौसम ने अंगड़ाई ली है और ठण्डक है! खुशी है! बहुत सारे इलाकों में इस बरसात से बहार आई है, तो कहीं न कहीं इस बरसात से कहर भी टूट पड़ा है…!

तो जहां बहार आई है, परमपिता परमात्मा से यही दुआ है कि उनकी बहार कायम रहे और जहां कहर टूटा है, तो परमपिता परमात्मा से ये दुआ है कि वो रहम करें, दया करें, उनकी रक्षा करें। क्योंकि बरसात के दो पहलू हैं जो दिखने में साफ आते हैं। पता नहीं, कितनों के लिए प्रलय होती है, कितने जीवों को ये बरसात एक साथ खत्म कर देती है, कहीं न कहीं उसमें इन्सान भी शामिल हो जाते हैं। सो मालिक रक्षा करने वाले हैं, उन्हीं से दुआ करते हैं।

पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने रूहानी सत्संग में फरमाया कि सत्संग में जब इन्सान चल कर आता है, तो उसके जन्मों-जन्मों की मैल सत्संग सुनकर अमल करने से मिट जाया करती है। सत्संग इस कलयुग में एक ऐसा सहारा है, जैसे डूबते हुए को नाव मिल जाए, बल्कि उससे भी बढ़िया तरीका है। आम कहा जाता है कि ‘डूबते हुए को तिनके का सहारा।’ पर अगर नाव ही मिल जाए तो… पूछिए मत! उसी तरह इस कलयुग में डूबते हुए जीवों को बचाने के लिए, उन्हें राहत पहुंचाने के लिए राम-नाम एक जहाज है, जो डूबते-तड़पते हुए उन जीवों का आधार है।

कोई उस नाम का जाप करे, सुमिरन करे तो फिर कहना ही क्या! …सो उस परमपिता परमात्मा के नाम का जाप हमेशा आप करते रहो। कहीं गुमराह न हो जाओ, कहीं आलस्य में न पड़ जाओ, कहीं भूल न जाओ परमपिता परमात्मा को, इसलिए संत, पीर-फकीर सत्संग लगाते हैं। जो लोग सत्संंग सुनकर अमल करते हैं, उनके अंदर-बाहर कोई कमी रहती नहीं।

उनके भाग्य, नसीब वाकई बुरे होते हैं, जो सत्संग सुुनते-सुनते भी बुरे कर्मों की तरफ चलने लगते हैं। जैसे सुनसान जंगल में एक आदमी रास्ता भटक गया और उस आदमी को चलते-चलते कोई रास्ता सूझा, उसे नहीं पता कि वो रास्ता कैसा है? बुद्धि-विवेक का काम लेता, तो पता चलता! उसने आव देखा, न ताव, बस उस रास्ते पर निकल पड़ा।

उस रास्ते पर जंगली जानवर हैं, दलदल है, जान बचाएगा तो कैसे? बहुत ही मुश्किल है। वो लुट जाता है डाकुओं के हाथों, घायल हो जाता है जानवरों के हाथों और फंस के रह जाता है दलदल में। लेकिन एक है, जो जंगल का जानकार है। उसे पता है कि जंगल का शार्टकट रास्ता कौन-सा है। उसे पता है ये रास्ता दलदल भरा है, ये जानवरों से भरा है, इधर डाकू रहते हैं और ये बिल्कुल सेफ रास्ता है। पर वो इन्सान फिर भी दलदल वाले रास्ते में चल पड़े, डाकुओं की तरफ चल पड़े या जंगली जानवरों वाले रास्ते में, जो खा जाएंगे, उस रास्ते में चल पड़े, तो क्या कहिए! ऐसे ही सत्संगी होते हैं, जो सत्संग सुनते हैं, नामलेवा होते हैं!

लेकिन जब वो ऐसे जंगली रास्तों पर निकल पड़ते हैं तो

‘ददै दोसु न देऊ किसै दोसु करंमा आपणिआ।।
जो मै कीआ सो मै पाइआ दोसु न दीजै अवरजना।।’

आप तो जानकार हो। जिसने सत्संग सुना, नाम ले लिया, वो तो जानता है कि ये रास्ता गलत जा रहा है। यहां पर काम-वासना, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार टूट पड़ेंगे, बर्बाद कर देंगे, वो तो सब जानता है। अगर जानते-बूझते हुए भी वो उस रास्ते का चयन करता है, तो फिर उसमें न भगवान को दोष, न गुरु, पीर-फकीर का दोष! वो अपने कर्मों की सजा भोगता रहता हैं, तड़पता रहता है, व्याकुल रहता है। इसलिए सत्संगियो!

आपको तो पता है कि गलत रास्ते पर नहीं चलना। फिर आप मन के लोभ लालच में क्यों चल पड़ते हो? क्षणिक स्वाद के लिए क्यों आप अपने सतगुरु से मुंह फेर लेते हो? क्यों सत्संगी-बातों को दरकिनार कर देते हो? क्यों नहीं अमल करते आप?

जब आप अमल नहीं करते, जब आप वचनों की काट करने लगते हो, तो जिंदगी में दु:ख आज नहीं, तो कल आने वाले हैं। फिर उसके लिए भी तैयार रहना। दु:ख आपने सहेजे हैं, तो फिर उनको भोगने के लिए भी आप तैयार रहना। फिर तो बड़ा भगवान-भगवान करते हो! राम-राम करते हो! पहले तो राम की सुनते नहीं! पहले तो संत, पीर-फकीर की सुनते नहीं और जब फंस गए और तड़पने लग गए, तो फिर भगवान शहद जैसा लगने लगता है। क्यों करते हो आप ऐसा? मन की वजह से? जवानी तो गधे पर भी आती है, आपके कोई अलग नहीं आई! आपकी जवानी कैसी?

वो जवानी जो सतगुरु के लेखे लगे, समाज के भले के लेखे लगे, जो भक्ति-इबादत में पल-पल गुजारे, अरे उस जवानी के बराबर दुनिया में, तीनों लोकों में कोई नहीं होता! उसकी भक्ति अव्वल दर्जे की मंजूर होती है, या कोई बचपन में लग जाए और आखिर तक निभा दे, उसकी अव्वल दर्जे की होती है। पर यहां तो जब दोहरा मापदंड अपना लेते हैं लोग, अपने सतगुरु को, राम को मूर्ख बनाना उनकी आदत बन जाती है। ये दिखाना कि मैं भगत भी हूं और काम वो करना जो संत पीर-फकीर रोकते हैं। तो फिर दु:खों के पहाड़ को गिरने से कोई रोक नहीं सकेगा! फिर तड़पोगे, रोओगे। तब आप होंगे और आपके दु:ख होंगे। कैसे कोई बचाएगा!

गुरु को मानते हो, पर गुरु की नहीं मानते हो, ये खतरनाक है। जब आपको समझ ही आ गई कि रास्ते दलदल से भरे हैं, जंगली जानवर आप पर हमला करने को तैयार बैठे हैं, तो राम-नाम का शार्टकट क्यों नहीं अपनाते? क्यों काम-वासना, क्रोध, लोभ, अहंकार, मन, माया को अपने पर टूटने का मौका देते हो? …बस ‘जोर जवानी का…’।

परमपिता जी ने एक भजन बनाया है, अरे वो नौजवान ध्यान दें, जो बिगड़ जाते हैं। जो मानते नहीं सतगुरु की और आंख दूसरी तरफ रखते हैं, गलत कर्म करते हैं। ‘गधा पच्चीसी उमरा जोर जवानी का…’ कि पच्चीस साल तक की उमर दुलत्तें झाड़ने वाली है। किसी को रोक दो आप, मां-बाप भी रोक दें, तो उनका दुश्मन बन जाता है। कि मुझे क्यों रोका? मैं मर्जी का मालिक हूं! मैं करूं सो करूं! यानि गधे की तरह दुलत्तियां झाड़ता है। संत, पीर-फकीर समझाएं, तो अगर उसके मन की बात कहते रहें, तो बड़ा खुश! पर आज जो करारी बातें हम सुना रहे हैं,

तो थोड़ा रूठेगा भी। गलत तू करेगा, तो तेरे को ही कहेंगे। हम तो चौकीदार है, आप पर निगाह रख रहे हैं कि मत करो बुरे कर्म और दिख भी ‘रहा है, करोगे तो भरोगे। और फिर चिल्लाओगे कि मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है?

आजकल क्या बच्चा, क्या बूढ़ा, क्या जवान सब काम-वासना, क्रोध, लोभ, मोह, अंहकार, मन-माया की गिरफ्त में हैं। बचा हुआ वही है, जिसने सच्चा इश्क वाहेगुरु, सतगुरु-मौला से किया हुआ है। वो चाहे बच्चा है, चाहे जवान, चाहे बूढ़ा है, वो ही बचा है, वरना इस कलयुग में…, मस्ताना जी महाराज के वचन है कि ‘सतगुरु का आशिक तो कोई-कोई है, सब माया के यार हैं।’ तो हम ये कहते सतगुरु की कृपा से ही कि आज बहुत से सतगुरु के भी यार है। बहुत बच गए उनके रहमो-करम से, उन्हीं की कृपा से।

खाने को घी, दूध, मेवे, मिठाइयां, खनिज, लवण, विटामिन मिले हैं, तो कोई गंदगी के ढेर पर चोंच क्यों मारेगा, बताइए! नहीं मारता ना? अब दूध पड़ा है, मेवे हैं, पनीर है, मिठाइयां हैं, यानी जो आपको पसंद है, वो सारा कुछ सजा हुआ है। उसको छोड़कर क्या आप कूड़ा-कर्कट खाओगे? सवाल ही नहीं पैदा होता जी! आप तो उनमें से भी चुनकर वो खाओगे जो उनमें से सबसे ज्यादा स्वाद आपको लगता है। पर हम देख रहे हैं, कुछ-कुछ बच्चे ऐसा भी करते हैं

कि सारा कुछ छोड़कर गंदगी के ढेर में चोंच मारते ही मारते हैं! मानते नहीं वो! उनके गेयर अड़ा हुआ है मन का। उनको लगता है कि जवानी हमारे पर ही आई और किसी पर तो आई ही नहीं, पहले वाले तो ऐसे ही बूढ़े हो गए! अरे, उम्र का तजुर्बा होता है। गुरु से सीखो तो बचपन में भी बुढ़ापे जैसी शिक्षा सीख लेता है आदमी, वरना उम्र के साथ-साथ शिक्षा आती है। इसलिए नादानियां छोड़ दो, बुरे कर्म छोड़ दो, इनमें कुछ नहीं रखा है और गुरु, पीर-फकीर के वचनों से नाता जोड़ लो। क्योंकि अगर उस सतगुरु से नाता जोड़कर रखोगे, तो ही खुशियां हैं, वरना भाई फिर चारपाई तो कहीं गई ही नहीं!

हमारा काम समझाना है। आपको बुरा लगे तो कोई बात नहीं, आपको अच्छा लगे तो भी कोई बात नहीं! क्योंकि एक टीचर तनख्वाह लेता है, वो पढ़ाता है, कई नहीं भी पढ़ाते, गपशप मार के भी आ जाते हैं। लेकिन अगर टीचर पढ़ाता है तो उसका काम हो गया। बच्चे फॉलो कितना करते हैं, वो अलग बात है। कई टीचर ऐसे होते हैं, जो बच्चों से फॉलो करवाते हैं। उनका दर्द लेते हैं! पढ़ाया, फिर फॉलो करवाया, फिर फॉलो करवाया।

फिर अपने तरीके से वो उनकी जांच करते रहते हैं कि कहीं भूल तो नहीं गए! तो वो टीचर सर्वश्रेष्ठ होते हैं और उनके बच्चे मैरिट लेकर उनका नाम रोशन करते हैं। पर, वो कब तक आपको पढ़ाएंगे? जब तक कि आप 20-25 साल के नहीं हो जाते, तब तक! डिग्री डिप्लोमा ले लिया, फिर तो आप ही पढ़ाने वाले हो जाते हैं। पर इस कलयुग में एक टीचर ऐसा भी होता है, जो पढ़ाता ही रहता है। और वो होता है ‘सच्चा गुरु’।

उसके लिए शिष्य बड़ा होता ही नहीं, छोटा ही होता है। हर पल उसकी निगाह रखता है वो। कदम-कदम पर उसे समझाता है कि बेटा, इसकी न सुन, उसकी न सुन। तू अपने जमीर की सुन। अपने सतगुुरु और जमीर की सुनेगा, तो तेरी तकदीर बनेगी। दुनिया की सुनेगा, तो बनी हुई तकदीर का बेड़ा गर्क हो जाएगा!

मन हावी होता है। आदमी तो आदमी है, लेकिन सतगुरु की जो मान ले, वो भाग्यशाली होता है। वो भी भागों वाला होता है, जो मान के अमल कर लेता है। चाहे कुछ भी क्यों न हो, फिर भी मालिक उस पर अपना रहमो-करम बरसाता रहता है। इसलिए मौसम बदले, न बदले, उसमें ठंडक आए, न आए, लेकिन हे भक्तजनो! हे प्रेमियो! हे मालिक के प्यारो! अगर सतगुरु, पीर-फकीर पर दृढ़ यकीन रखोगे, सेवा-सुमिरन करते रहोगे, परहित-परमार्थ में तन-मन से लगे रहोगे, तो यकीनन आपके लिए तो मौसम बहार ही रहेगा यहां भी और अगले जहां में भी! किसी के पतझड़ आए तो आए उसके कर्म! पर जिसने दृढ़ यकीन कर लिया, दृढ़ विश्वास रखा, उसके कभी पतझड़ नहीं आता।

उसके बहारें ही छाई रहती हैं। बल्कि देखने वाले हैरान होते रहते हैं कि यार, कल ये ऐसा था, आज ऐसा हो गया! यार, ये कहां से कहां पहुंच गया…! कैसे? लेकिन ‘कावां दे आखे ढग्गे नी मरेया करदे…’। अगर वो आपकी निंदा करते हैं, आपसे जलते हैं, तो आप मत जलो। आप उनकी निंदा मत करो। उनके जलने से, उनके निंदा करने से आपके और कर्म कट जाएंगे और आप मालामाल होते चले जाओगे। कोई नजर नहीं लगती सत्संगियों को, न बुरी नजर लगे न अच्छी।

मालिक की नजर उन पर छाई रहती है। न उन्हें दु:ख आता है न सुख। आप सोचेंगे कि सुख-दु:ख ही नहीं आता तो क्या फायदा! सुख तो आना चाहिए! अरे, नहीं! उन्हें परमानंद ही रहता है।
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