रूहानी सत्संग (26 मार्च 2017) पूजनीय परमपिता शाह सतनाम जी धाम, डेरा सच्चा सौदा, सरसा

डीएनए के लिए कदम बढ़ाएं

यह कलियुग का भयानक समय है और इस भयानक समय में मन-इंद्रियां बड़े जोरों पे हैं। हर इन्सान आज इतना चतुर-चालाक, होशियार अपने-आपको मानने लगा है कि भगवान को तो वो कुछ समझता ही नहीं! उसे लगता है कि जितनी अक्ल, जितनी समझदारी मालिक ने मुझे बख्शी है, शायद ही कोई दूसरा ऐसा जन्मा हो! लेकिन ये इन्सान का भ्रम, गलतफहमी है।

उस मालिक ने सबको दिमाग दिया है, लेकिन कोई ज्यादा इस्तेमाल करता है और कोई कम इस्तेमाल करता है, सिवाय उन मंदबुद्धियों के जिन पर कर्मों की मार है। जो मंदबुद्धि ही पैदा हुए, उनको अगर छोड़ दें, तो नॉर्मल इन्सान का दिमाग बेहद जबरदस्त है। आज तक सार्इंस इन्सान के दिमाग को 10-15 प्रसेंट ही पढ़ पाई है और आज सुपर-कम्प्यूटर बन गए, मिसाइलें बनी हैं, खात्मे का साजो-सामान, हाईड्रोजन तक बन गए! यह सब दिमाग का 5-10 प्रसेंट इस्तेमाल करने से हो गया। अगर इसका ज्यादा इस्तेमाल किया जाए, तो क्या से क्या हो नहीं सकता है!

आज दुनिया तबाही के रास्ते पर जा रही है, तो काश! सारे सार्इंटिस्ट इस काम में लग जाएं कि इन्सान को ज्यादा से ज्यादा सुख कैसे मिले! ज्यादा से ज्यादा दिलो-दिमाग में शांति कैसे आए! ज्यादा से ज्यादा शांतमय रहते हुए आनन्दमय जीवन कैसे व्यतीत किया जाए! तो भगवान का नाम सार्इंटिस्टों को भी बहुत रास्ते दिखा सकता है। लेकिन जैसा कि शुरू से चलता आया है, इन्सान के खात्मे के लिए बनाए जाने वाले साजो-सामान पर रिसर्च ज्यादा होती है, इन्सान के अंदर भुखमरी न आए, इसको रोकने के लिए रिसर्च बहुत कम होती है।

अगर ये रिसर्च कर दी जाए, तो हम कहते हैं कि कोई दु:खी न रहे बाहरी तौर पे। साथ में ईश्वर का नाम ले तो अंदरूनी तौर पर भी सुखी हो सकता है।
इन्सान में एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ मची हुई है। देशों में होड़ मची हुई है एक-दूसरे से ज्यादा टेक्नोलॉजी लाकर डराने की। जबकि होड़ बहुत कम नजर आती है इन्सानियत, सृष्टि का भला करने की। काश! सार्इंटिस्ट तबाही का मार्ग त्यागकर, भलाई की चीजें बना दें, तो हमें लगता है कि गाड़ियों के लिए पेट्रोल, डीजल की जरूरत ही न रहे! ये गैस-सिलेण्डर इत्यादि साजो-सामान की जरूरत ही न पड़े! क्योंकि उन तत्वों से बहुत एनर्जी पैदा की जा सकती है।

सूरज एक ऐसा तत्व है, या दूसरे शब्दों में, सूरज ऐसी शक्ति है, जिससे इतनी एनर्जी हासिल कर सकते हैं कि बैटरी की जरूरत नहीं, कोई डीजल-पेट्रोल की जरूरत न पड़े, किसी गैस सिलेण्डर की जरूरत न पड़े! अगर ऐसा हो जाए, तो लोगों के घरों में चूल्हे फ्री में जलेंगे। साईकिल, गाड़ी, मोटरसाईकिल वगैरह सब फ्री में चलेंगे! क्योंकि फिर तो साईकिल पर भी इंजन लग जाएगा, क्योंकि उसने तो सूरज से ही चार्ज होना है।

लेकिन इस तरफ कोई दिमाग लगाता ही नहीं! एक हद तक दिमाग लगाते हैं, फिर छोड़ देते हैं। अगर कोई सीधा-सादा आदमी ऐसा करे भी तो कह देते हैं कि तू ऐसा नहीं कर सकता! तू कानूनी दायरे से बाहर है! यानि बहुत सस्ते में बहुत बढ़िया चीजें बन सकती हैं।

डीएनए के ईलाज के लिए हमारे डॉक्टर, सार्इंटिस्ट अगर लग जाएं, तो जो रामायण काल में होता था कि आदमी का डीएनए ठीक कर दिया जाता था और वो सैकड़ों साल जिंदगी जीता (जीवित-रहता) था। कभी भी उसको दु:ख नहीं आता था। लेकिन यहां तो दवाई की सारी फैक्ट्रीज बंद हो जाएंगी! वो होने ही क्यों देंगे डीएनए के टेस्ट! पूरे वर्ल्ड में सबसे ज्यादा मुनाफा कमाते हैं लोग इससे। तीन के तैंतीस लेते हैं!

बुरा न मानना! और क्षेत्रों में भी यही हाल है! पर जो ख्याल में आ गया, वो हमने बोल दिया। हमें ऐसा लगता है, ये हमारे विचार हैं। हो सकता है कि तीन के तीन सौ भी होते हों, हमें क्या पता, और हो सकता है कि तीन के तेरह भी हों, क्या कह सकते हैं! लेकिन है गड़बड़ जरूर, ये पक्का है। वरना हमने देखा है कि एक ही दवाई एक जगह पर तीन रुपए की मिलती है और एक जगह तीस रुपए की भी मिलती है! क्यों भाई? सेम साल्ट है, सेम सबकुछ है! वे बेचारा कोई दानिशमंद देता है, कमाई नहीं करता। वो कहता है कि मैं पांच-दस पैसे कमाता हूं! इसका मतलब दो रुपए नब्बे पैसे की पड़ती है और उसी के तीस रुपए लेते भी देखा हमने लोगों को! हर बिजनेस, व्यापार में ये चीजें हो रही हैं।

तो काश! हमारे सार्इंटिस्ट, डॉक्टर इस बारे में कदम उठाएं कि हम इन्सानियत के भले के लिए डीएनए तक जाएंगे। हमने यहां हमारे डॉक्टरों, सत्संगी डॉक्टरर्स वो यूएसए में भी हैं, हम उनको कहते रहते हैं कि बेटा, आप डीएनए के बारे में रिसर्च करो।

आज यहां काफी डॉक्टर्स आए हैं, क्या आप बता सकते हैं कि शाम को लोग तलवारों, भालों से लड़ें, यहां तक कि एटम जैसी शक्ति का सामना भी किया, जख्मी हो गए, बेहोश हो गए, लेकिन अगले दिन तलवार लेकर फिर से लड़ रहे हैं, कैसे? महाभारत पढ़कर देखो, कितनी बड़ी सार्इंस थी तब! एक ‘स्नेहलेप’ नाम था, कितना भी बड़ा जख्म हो ‘स्नेहलेप’ की रात को लुगदी बनाकर भर देते थे और सुबह तक जख्म भर जाता था।

क्या था वो? लेकिन आप तो मरहम देते हैं, वो झरीट भी दस दिन तक ठीक नहीं होती। ज्यादा है तो दो इंजेक्शन और चढ़ा देते हो! तो हम जरूर चाहेंगे कि आप जो कर सकते हो रिसर्च, वो जरूर करें! स्टेमसैल आपने ढूंढ लिए हैं, ये उसकी तरफ पहला कदम है हमारे एकॉर्डिंग, ईश्वर ने जो दिखाया! ये पहला कदम है अगर डीएनए की तरफ आप बढ़ोगे तो। स्टेमसेल बहुत अच्छी चीज है! बहुत शक्ति है!

थोड़े में बहुत-कुछ है। ‘गागर में सागर’ कहें तो गलत नहीं। लेकिन अभी डीएनए वाली चीज से बहुत दूर हैं। कहीं न कहीं इस पर रिसर्च हो रही होगी! लेकिन उनको रोका जाएगा! क्योंकि, अगर डॉक्टर्स डायरेक्ट डीएनए ठीक करने लग गए, तो सारी दवाई की फैक्ट्रीज बंद हो जाएंगी। ज़रा सोचिए, कितना बड़ा मक्कड़जाल है! वो क्यों बंद होने देंगे! लेकिन ये हो सकता है!

हम, हमारे देश के, विदेशों के जो भी सार्इंटिस्ट हैं, जो इन्सानियत का भला चाहते हैं, उनसे जरूर गुजारिश करते हैं कि वो डीएनए की तरफ कदम जरूर बढ़ाएं। अरे, अमीर से अमीर, गरीब से गरीब हर इन्सान सुखी हो जाएगा। ईश्वर ने जो समय लिख दिया, वो तो भोगना है, लेकिन क्यों न तंदुरुस्ती से भोगा जाए! ये पॉसिबल है। डीएनए से ही आदमी का वजन कम हो, ज्यादा हो कुछ भी किया जा सकता है। कुछ भी।

ये राम-नाम में है सब-कुछ। कोई समय ऐसा था, जब राम-नाम का जाप करने वालों ने ये चीजें ढूंढ ली थी। मृतप्राय: लोगों को एक सैकेंड में जड़ी-बूटी सुंघा कर जिंदा कर देते थे और मरने नहीं देते थे। लक्ष्मण जी मूर्छित हो गए थे, कोमा में चले गए थे, और यह हो गया था कि वो मृतप्राय: हैं। लेकिन कहते हैं कि उस वैद्य ने कह दिया था कि इतने समय तक मैं इसके शरीर से प्राण नहीं निकलने दूंगा। तो उन्होंने लक्ष्मण जी के प्राण नहीं निकलने दिए।

और उन्होंने कहा कि ये जड़ी-बूटी ला दो, तो पल में ठीक कर दूंगा। फिर हनुमान जी वो जड़ी-बूटी लेकर आए और वैद्य जी ने वो जड़ी-बूटी दी, तो लक्ष्मण जी ऐसे बैठ गए, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। क्या आज हम नहीं कर सकते वो चीजें?
अब आप कहोगे कि जी, रामायण, महाभारत थी नहीं। कल को आप कहोगे कि चंद्रमा नहीं होता था, सूरज नहीं होता था! तो भाई आपका क्या कहना! ये फिजूल की बातें हैं।

हम गारंटी देते हैं कि महाभारत हुआ और रामायण-काल भी था। आप बहुत सी चीजें जान सकते हो, अगर गूढ़ अध्ययन करो। लेकिन ये संभव तभी होगा, जब आपकी रिसर्च उस तरफ जाएगी। जब तक आप उस तरफ बढ़ते ही नहीं, आपको मंजिल नहीं मिलती।

इस घोर कलियुग में बहुत जरूरी है कि इन्सानियत के लिए कुछ न कुछ किया जाए! और ये इन्सान ही कर सकता है, पशु, पक्षी, पेड़-पौधा नहीं कर सकते, लेकिन इन्हीं से मनुष्य करवा सकता है। इन्सान एकमात्र ऐसा है, जिसके अंदर दिमाग बेहिसाब है। हाथी के सूंड से कम ताकत है इन्सान में! लेकिन हाथी के ऊपर बैठकर इन्सान इसे कहीं भी ले जा सकता है। शेर दहाड़ मार दे, तो आदमी का दिमाग फट जाए! पास से दहाड़ मार दे, तो कान के पर्दे फट जाएं! लेकिन आदमी अपने इशारों से शेर को नचाता है।

…तो क्या-क्या नहीं कर सकता इन्सान का दिमाग और वो भी 10-15 प्रसेंट की रेंज में! कहीं 50 प्रसेंट तक चले जाओ, तो पता नहीं क्या से क्या हो जाए! कहने का मतलब है कि आप अपने-आपको मंदबुद्धि मत समझा करो! अपने-आपको नेगिटिविटी का शिकार मत बनाया करो कि मुझे कुछ नहीं आता! मैं तो फेल ही होऊंगा! मेरे में तो कुछ भी नहीं है! क्यों नहीं है भाई? ये ऊपर का खाना (दिमाग) मालिक ने भर रखा है। इस्तेमाल करो या न करो, वो आपकी मर्जी है। लेकिन सामान सबका ए-क्लास है इस दिमाग में, लेकिन इस्तेमाल कैसे करते हो, वो आप पर निर्भर है।

आज के दौर में बहुत जरूरी है कि कोई परहित, परमार्थ के बारे में सोचे। अपने दिमाग में अच्छी, भली सोच लाया करो! संत, पीर-फकीर कभी किसी का बुरा नहीं सोचते, बुरा नहीं करते। जब आदमी के अंदर खोट, दोष होता है, तो पंजाबी में एक कहावत है, ‘आप दा पाला आप नूं ही मार जांदा ए’, मतलब कि जब खुद में कोई कमी होती है, उससे बचने के लिए जब वो संतों में कमी निकालने लगता, क्यों किंतु परंतु जब शुरू हो जाती है, तो वो अपने कर्मों की वजह से दु:खी, बेइन्तहा दु:खी होना शुरू हो जाता है।

अपने-आपको बचाने के लिए हत्थकंडे अपनाता है, दूसरों का इस्तेमाल करता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कोई ऐसा भी है, जो आपके दिमाग की बात, आने से पहले ही पढ़ लेता है! जो बोलने से पहले ही जानता है कि आप क्या बोलोगे! और जो वीडियो बना रहा है आपकी लाईव कि हां, ये बंदा, ये कर रहा है। उससे कैसे बचोगे! कहने का मतलब है कि जो करता है, वो भरता जरूर है।

फकीर के सामने चाहे जितने मर्जी गप मारते रहो, लेकिन इस तरह आप अपने-आपको ही बुद्धू बनाते हो। क्योंकि वो राम, अल्लाह, वाहेगुरु, गॉड, ईश्वर सबके अंदर बैठा हर पल, हर क्षण का हिसाब रखता है। वो जानता है कि तू बंद कमरे में क्या करता है! वो जानता है कि दूसरे के कंधे पर रखकर तू कैसे चलाता है! वो अन्जान नहीं है! अरे, तेरे जैसे अरबों बनाएं हैं उसने!

कई बार इन्सान को लगता है कि भगवान है ही नहीं। ऐसे लोग जरा बताएं कि क्या आप आदमी के जैसा दिमाग बना सकते हो? अरे आदमी छोड़ो, एक कीड़े जैसा दिमाग ही बना हो? अभी तक तो किसी ने बनाया नहीं! …तो कमाल की रचना करता है वो रच्यता। दो सगे भाइयों के हाथों के निशान अलग-अलग होते हैं। दो सगे भाइयों की तकदीर कई बार अलग-अलग देखने को मिलती है।

एक ही मां, एक ही बाप, एक ही रगों में बहने वाला खून, लेकिन दोनों की तकदीर अलग-अलग क्यों? बताए कोई सार्इंटिस्ट कि कौन से जीन्स में कमी आ गई? मां-बाप अमीर, उनके एक बेटा अमीर और एक गरीब, क्यों? तो बहुत से ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब सार्इंस के पास नहीं है। लेकिन रूहानियत में इसका जवाब है कि ‘इन्सान जैसे कर्म करता है, वैसा फल आने वाले टाईम में भोगना पड़ता है।’

इन्सान मनघड़ंत चीजों पे चलता रहता है। और मन इतना जालिम है जो इन्सान को डुबोने में ज्यादा देर नहीं करता। कई बार आपको बात सुनाई है ‘आत्मा और मन’ की। उदाहरण दिया है आपको, कि एक बुजुर्ग माता थी। उसने दो पालतू पशु रखे हुए थे। एक था बंदर और एक था बकरा। एक दिन वो बुजुर्ग सब्जी काट रही थी, अचानक संदेश आया कि उनके घर मेहमान आने वाले हैं। उसने सोचा कि चलो, दुकान से कोई सामान वगैरह ले आऊं।

वो सब्जियां वहीं पड़ी रही। बकरा और वो बंदर वहीं बंधे हुए थे। लेकिन जब वो बुजुर्ग वापिस आई, देखा, कि सारे फल गायब थे और बकरा खुला हुआ था और सब्जियों में मुंह मार रहा था। बुजुर्ग ने आंव देखा न ताव, डंडा उठाया और उस बकरे के 8-10 धर दिए! पड़ोसी ये सब देख रहा था, उसने बुजुर्ग को रोका। बुजुर्ग ने कहा कि क्या है, ये मेरी सारी सब्जियां खा गया! पड़ोसी ने कहा कि ताई, मैं देख रहा था, इस बंदर ने अपने गले से रस्सा निकाला, आया और सारे फल खा गया, आधी सब्जी खा गया।

बाद में बकरे का रस्सा खोल दिया और खुद गले में रस्सा डालकर आराम से बैठा है! काम उसका है और पड़ बकरे की रही हैं! इसी तरह काम ‘मन’ का होता है और पड़ती ‘आत्मा’ को है। नेगिटिविटी जिनके अंदर होती है, उनको किसी पर भी यकीन नहीं आता। ऐसे लोग कभी किसी के यकीन के पात्र बन ही नहीं सकते। कितना भी अपने आपको चेंज कर लें, कुछ भी कर लें, वो बिन पैंदे के लौटे की तरह होते हैं।

न उनका राम में यकीन, न भगवान में यकीन, न पीर-फकीर में यकीन। वो एक बात सुनाया करते हैं कि ‘यमुना गया तो यमुनादास और गंगा गया तो गंगाराम!’ मतलब कि ‘जिसने लाया गल्लीं उसे वल तुर चल्ली!’ अजीबो-गरीब बातें हम देखते रहते हैं, मुस्कुराते रहते हैं! फिर भी मालिक से दुआ करते रहते हैं कि मालिक, सबको सद्बुद्धि बख्शें। असल में लोगों को अपना सिक्का चलाना होता है! जब लगा कि सिक्का नहीं चला, तो गड़बड़ और चल गया तो खोटा भी अच्छा!

तो इस कलियुग में राम का नाम जपना अति जरूरी है। राम-नाम के बिना आपको सद्बुद्धि नहीं आएगी। आप दूसरों के भले की तो छोड़ो, अपना भी भला नहीं कर पाओगे। आपको भक्ति करनी पड़ेगी। चाहे पंद्रह मिनट करो, आधा घंटा सुबह-शाम करो, वो आपकी मर्जी, लेकिन करो जरूर। उससे आपको सही रास्ता मिलेगा और आप परमपिता परमात्मा की खुशी हासिल कर पाओगे।

राम-नाम लेना, आपको लगता है कि मुश्किल है, लेकिन राम का नाम लेना बहुत ही आसान है। सार्इं मस्ताना जी, शाह सतनाम जी दाता ने सिर्फ तीन ही शब्द बना दिए। सोचो, अगर एक ग्रंथ दे दिया होता तो क्या करते आप! और वो तीन शब्दों का भी आप जाप नहीं करना चाहते! कई लोग बड़ा अजीबो-गरीब जवाब देते हैं कि जी टाईम नहीं लगता! कमाल की बात है! क्या आप पोटी (टॉयलेट) नहीं जाते? आजकल के बच्चे तो आधा-आधा घंटा फोन पर बात करके निकाल कर आते हैं। तो बजाय फोन पर बात करने के राम का नाम ले लिया करो।

‘उधर भी काम और इधर भी काम, पता नहीं कब मिल जाए राम।’ बताओ कौन सा आपका काम छुड़वाया? आप गाड़ी चला रहे हो, तो चलते जाओ, हाथों से गाड़ी चलाते जाओ, पैरों से क्लच, ब्रेक, रेस दबाओ और जीभा को अल्लाह, वाहेगुरु, राम के साथ लगाओ, बताओ, क्या काम छुड़वाया आपका? तेरी गाड़ी भी जा रही है और उधर वाली गाड़ी भी जा रही है, पता नहीं कौन सी गाड़ी कहां पहुंचा दे। इसलिए ऐसे फिजूल के बहाने मत बनाया करो।

ऐसे बहाने तो पहली कक्षा के बच्चे भी नहीं बनाते, जैसे आप बनाते हो कि टाईम नहीं मिलता। कमाल है! रोटी खाते हो सही टाईम पे, ब्रेकफास्ट करते हो सही टाईम पे! लंच-डिनर सही टाईम पे! और राम-नाम के लिए टाईम नहीं है बस। गप मारने हों तो सारी-सारी रात प्रोग्राम चलता है और सतगुरु के पास बैठना हो तो नींद आने लगती है! सत्संग सुनते हो तो मुंह फाड़-फाड़कर उबासियां लेते हो।

निंदा-चुगली में बड़े चटकारे ले-ले कर बातें करते हो, लेकिन राम-नाम के समय आपको क्या हो जाता है? कपड़े प्रैस करना आप नहीं भूलते! हम ऐसा नहीं कहते कि प्रैस क्यों करते हो? करो, कोई हर्ज नहीं! बाल संवारने लगते हो तो आगे से शीशा बेचारा शरमा जाता है, वरना आप तो लगे रहते हो! पगड़ी बांधने में, टूटी-शूटी लगाने में पता नहीं कितना टाईम लगाते हो। हम नहीं कहते कि मत लगाओ, आप चाहे जितनी मर्जी टूटियां लगाओ! हमारे कहने का मतलब है कि हर काम के लिए आपके पास टाईम है, तो दस मिनट अल्लाह, वाहेगुरु, राम के लिए टाईम क्यों नहीं है आपके पास?

कोई जमीन उपजाऊ है या नहीं, जब उसमें बीज डलता है, तब उसके बारे में पता चलता और बीज तभी डलेगा, जब उस भूमि को संवारा जाता है। पहले हल चलाते हैं, घास-फूस साफ करते हैं, फिर पानी देते हैं, खाद डालते हैं, बीज डालते हैं, फिर कहीं जाकर फसल होती है। कोई दुकानदार दुकान खोलता है, रंग-रोगन करता है, सामान लाता है, मशहूरी करता है, फिर कहीं जाकर दुकान चलती है। बच्चे पढ़ाई करते हैं फर्स्ट क्लास से लेकर डिग्री-डिप्लोमा लेने में कितने साल लगाते हैं, तब कहीं जाकर मास्टर्स, डॉक्टर की डिग्री हासिल होती है।

लेकिन इधर कहते हैं कि कोई हमें भगवान दिखा दे, हम मान जाएंगे। वाह भई वाह! अरे, छोटी सी डॉक्टरेट की डिग्री के लिए जीवन के 20-25 साल आप लगा देते हो, और भगवान के लिए एक पल भी नहीं लगाया और कहते हो कि भगवान दिखा दो! क्यों भई? चट्टी पड़ी है भगवान को, जो तेरे को दे दे! चट्टी तो तेरे को पड़ी हुई है, जो 84 लाख जूनियां भोग कर आया है! जो दर-दर की ठोकरें खाकर अब तुझे इन्सान का शरीर मिला है।

तुझे चाहिए कि तू मालिक को मिले, वरना उसको किसी से कोई मतलब नहीं! लेकिन देखो, भगवान फिर भी बहुत दयालु है। इसलिए वो समय-समय पर अपने संत, पीर-फकीर इस धरती पर भेजता रहता है, ताकि उससे बिछुड़ी हुई औलाद उससे जाकर वापिस मिल जाए। लेकिन आप संतों से ही आगे निकल जाओ, पढ़ के कढ़ जाओ तो संत क्या करें! फिर भोगते रहो अपने कर्म!

संत एक हद तक दखल दे सकते हैं, उसके बाद चुप हो जाते हैं। क्योंकि संतों की भी एक सीमा होती है। वो सत्संगों में जीव को समझाते रहते हैं, जो सुनकर अमल कर लेता है, उसका बेड़ा पार हो जाता है, वरना कर्मों का भार इन्सान झेलता रहता है। संत बार-बार कुछ न कुछ बताते हैं, कुछ न कुछ देते हैं। आप जितनी बार भी सत्संग में आते हो, चाहे 15 मिनट, चाहे आधा घंटा, या घंटा सुनते हो, तो हो नहीं सकता कि वो घंटा आपकी पूरी जिंदगी न बदल दे, अगर सुनकर अमल कर लो।

लेकिन कुछ लोग तो एक कान से सुनते हैं और दूसरे से निकाल देते हैं। कुछ कहते हैं कि तेरे को कहा? वो कहता कि नहीं, तेरे को कहा। अरे, हम तो सबको ही बता रहे हैं। अब जहां जख्म होता है, स्प्रिट तो वहीं लगेगा और जख्म नहीं है, तो एंटीबॉयटिक का काम तो करेगा ही करेगा! कहने का मतलब कि कमी अगर आपमें है, तो घण जैसी चोट लगेगी ही लगेगी और अगर आपमें कमी नहीं है, तो आप और संवर जाएंगे। लोहे से सोना बन जाएंगे।

संत किसी दूसरे को थोड़े ही न सुनाते हैं? जो सत्संग में आएगा, बैठेगा, सुनेगा, जिसकी जैसी भावना, जैसी सोच हमारे पास आ रही है, अल्लाह, राम हमें बता रहे हैं और हम बोले जा रहे हैं। माईक की क्या औकात, जो अकेला बोल दे? इसमें जैसी फूंक फूंकेंगे वैसी आवाज आप तक पहुंचेगी। उसी तरह हम तो माईक हैं भाई, आपके सेवादार, चौकीदार हैं। जैसी फूंक वो मालिक मार रहा है, आप तक आ रही है। इसलिए सुनकर अमल कर लो। ज्यादा एक्टिंग मत करो।

अभी हम फिल्मों में काम करते रहते हैं आपके भले के लिए, तो वहां हम एक बात कहते रहते हैं बच्चों को कि ओवर एक्टिंग मत कर। लेकिन यहां आपको क्या बोलें! जब हम निगाह मारते हैं, तो जानबूझ अनजान से बनते हैं। लेकिन जब आप ऐसे करते हो, तो ज्यादा पता चलता है कि कुछ छुपा रहे हो। कहने का मतलब है कि पता तो हमें सब है, लेकिन जैसा तूं, वैसा चल और जैसे चलना चाहे, चलता जा। हमने क्या लेना है भाई! अगर तू ओवर-स्मार्ट बनके चलना चाहता है, तो चल! तेरी मर्जी! लेकिन संत किसी का बुरा नहीं कर सकते, कभी सोच में भी बुरा नहीं कर सकते।

हालांकि लोग सतगुरु-मालिक के रहमो-करम को जल्दी में भूल जाते हैं। हमने देखा है। परमात्मा ने जिनको जिंदगी बख्श दी, उसे पता था कि मेरी इस पल मौत हो जानी थी, उसे पता था कि मेरे जिंदगी बर्बाद हो जाती, लेकिन खूब गाया, वाह राम! वाह राम! और जब वो ठीक हो गया, तो कहने लगा कि वाह राम, मैं सही हूं, अब तेरा क्या काम? फिर अपने-आपको सही साबित करने के लिए गैरों का साथ तक लेते हैं लोग।

कहावत है एक पंजाबी की, ‘लंडे नूं खुंडा सौ कोह तों टकरदै’ …यानि, ऐसी बातें करने वाले को वो भाग कर पकड़ते हैं कि अच्छा…, तू सही कहता है यार! बस, हो गया काम शुरू! सारी भक्ति उड़ जाती है और पल्ले रह जाती हैं झूठी बातें। वही यार-दोस्त अच्छे लगते हैं, जो हां में हां मिलाएं और कोई सच्ची बात कह दे, तो कड़वा लगता है। कभी फकीरी की तकड़ी में तौलकर देखा करो। और हम आपको गारंटी देते हैं, यहां इतनी साध-संगत बैठी है, कोई एक भी बता दे कि हमने कभी वचन करके या वैसे कहकर किसी का बुरा किया हो? हो ही नहीं सकता।

हां, गुस्से में जरूर बोले होंगे किसी न किसी को, और राम, अल्लाह, वाहेगुरु जानता है कि उस गुस्से में, क्या पता आपका पहाड़ कब राई बन गया, ये राम जाने। कैसे फिल्म दिखाएं आपको कि कैसे कर्म काटते हैं वो भगवान! राम का नाम जपने वालों की कैसे सहायता करते हैं राम! देखना चाहते हो, तो घंटा-घंटा सुबह-शाम सुमिरन करो, सच का सच और झूठ का झूठ सामने होगा!

आप सुमिरन जरूर किया करो। लेकिन आप तो ऐसे लोगों के साथ रहते हो, जो न सुमिरन करते हैं, न भक्ति करते हैं, न सेवा। एक कहावत है, ‘आप डुबेंदे बाह्मणां जजमान वी डोबो…’। यानि ऐसे लोगों से बात करोगे, तो भक्ति कहां से खिलेगी! वो तो कहेंगे कि छोड़ यार, क्या हासिल हुआ तुझे! लेकिन ये याद रखो कि जो इन्सान जिस काबिल होता है, फकीर उसको वैसा ही बख्शते हैं। फकीर कभी भी गलत नहीं हो सकते।

उनको गलत कहने वालों के कर्म बुरे आ जाते हैं, शायद इसलिए वो बुरा बोलते हैं फकीरों को! हम नहीं चाहते कि किसी का बुरा हो! भगवान सबका भला करो, सबका भला हो, बुरा कहने वाले भी मालिक की दरगाह में बख्शे जाएं, यही मालिक से दुआ कर सकते हैं! बाकी मालिक की मर्जी! कईयों ने मस्ताना जी के समय बोला, फिर परमपिता शाह सतनाम जी महाराज के टाईम बोला और आजकल भी लोग बोलते रहते हैं, लेकिन सोचा करो कि फकीर गलत क्यों करेगा! क्या उसने पहले गलत किया? फिर भी लोग कहते हैं कि पहले तो नहीं, अब करता है।

तो भाई, आपको क्या पता वो क्या करता है? क्या आप जानी-जान हो? …और जब सच्ची बात बताओ तो फिर कहते हैं कि ओ… हो…! अगर आपने ओ हो… ही करना था, तो फिर गलत बोले ही क्यों? कहने का मतलब है कि आप किसी को बुरा मत कहो, जब तक उसके बारे में जानते नहीं। जान गए, तो भी बुरा मत कहो, क्योंकि कल को वो अच्छा हो गया और आपने उसको दोस्त बनाया, अगर बुरा कहा हुआ है, तो फिर क्या होगा! सच्ची बात कड़वी लगती है। कोई सच कह दे, हम रोज आजमाते हैं कि कोई सच कह दे, तो मिर्ची लगती है और कोई लीपा-पोती करता रहे, तो अच्छा लगता है।

संत हमेशा सबका भला करते हैं। ‘तरुवर फल नहीं खात है, सरुवर पीव न नीर। परमार्थ के कारणे, संतन भयो शरीर।’
पेड़-पौधे फल खुद नहीं खाते। समुद्र अपना पानी खुद नहीं पीते, वो सब दूसरों के लिए होता है। वैसे ही संत सब कुछ समाज के भले के लिए करते हैं। पर्सनल उनका अपना कोई हित नहीं होता। लेकिन इन्सान की बुद्धि जब भ्रष्ट हो जाती है, तो उसे लगता है कि नहीं, गलत है।

एक कहावत है, ‘पहलां मंजे थल्ले सोटी मार’। मतलब कि पहले खुद के बारे में तो विचार कर ले। तू कहां से तीस मार खां भक्त आ गया! कौन सी ऐसी भक्ति कर रखी है, जो फकीर को पहचान गया! फकीर की बातों में राज होता है, उसे गलत तरीके से मत लिया करो। अगर उसने वचन कहा है, तो सौ प्रसेंट आपका फायदा होगा, नुक्सान नहीं होगा। तरोड़-मरोड़कर, मसाला लगाकर वचनों को कुछ और मत बनाया करो। मर्जी आपकी है।

हमें कोई दु:ख नहीं लगता। लेकिन लगता भी है! दु:ख इसलिए नहीं लगता कि हमारी बात क्यों काटी, बल्कि इसलिए दु:ख लगता है कि वो बात राम ने कहलवाई है, उसमें आपका पता नहीं कितना फायदा होने वाला था और वो आपका नुक्सान हो गया।

फकीर सबका भला सोचते हैं, भला करते हैं, लेकिन ये कलियुग है, यहां भला किया हुआ लोग चुटकी में भूल जाते हैं। जिंदगी तक जिस मालिक ने दी हो, भूल जाते हैं वो कि यार, जब मेरी जिंदगी उसकी दात है, तो मेरा मुझमें क्या है! गुरुसाहिबानों ने ऐसे ही तो नहीं लिख दिया कि ‘मेरा मुझमें कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा। तेरा तुझको सौंप दे, क्या लागे है मेरा।’ ये दो लाईनें ही अगर कोई मान ले, तो ऐसा हो ही न कि कोई राम का ऋण न उतार पाए।

उसको पता है कि लाईफ में ये पल था और अब ये पल है, किसकी वजह से? तो मतलब ही नहीं है कि इन्सान उस राम के प्रति कभी गलत बोले। अरे, जिसने जिंदगी ही बख्श दी, उसके बारे में कुछ तो सोचा करो, उसका शुक्राना तो किया करो। अगर आप शुक्राना करते हो, तो भी वो शुक्राना नहीं करवाएगा, बल्कि बदले में खुशियों के, दया-मेहर, रहमत के ढेर लगा देगा।

फकीर यह नहीं कहता कि मेरी पूजा करो। बल्कि फकीर कहता है कि पूजा उसकी कर, जो तेरे अंदर रहता है। जिसने सारी सृष्टि को बनाया है। पूजा उसकी कर जो अल्लाह, वाहेगुरु, राम है। और पूजा के लिए नोट-वोट की जरूरत नहीं है! बल्कि अगर उसकी याद में तड़पते हुए तेरी आंख से एक आंसू भी बह गया, तो वो हीरे-जवाहरात से बढ़कर मालिक दान मानेगा और खुशियों से लबरेज कर देगा।

हमने देखा है कि लोग वैराग्य पैदा करने के लिए मरे हुए मां-बाप को याद करके रोने लग जाते हैं। ये सब एक्टिंग में तो ठीक है, लेकिन अगर आप यह दिखाओ कि मुझे तो भगवान की याद में वैराग्य आ गया, ये गलत है। वैराग्य लाया नहीं जाता, आ जाता है। और वो जब आ जाता है, तो ईश्वर को भी ले आता है। ‘तरी के रास्ते भगवान को बहुत जल्दी पाया जाता हैं।’ खुश्क नमाजें, खुश्क रोजे, खुश्क भक्ति-इबादत में सालों तक लगे रहो, कुछ फर्क पड़ता नहीं और तरी के रास्ते, वैराग्य के रास्ते लोग कुछ घंटों में ही मालिक को पा लेते हैं! तो भाई, ये वैराग्य का रास्ता इन्सान को मालिक तक जल्दी ले जाता है!

लेकिन कोई भाग्यशाली जीव होता है, जिसकी आंखों से आंसू की दो बंूदें अल्लाह, वाहेगुरु, राम के लिए निकलती हैं! लेकिन यहां ऐसा होता है कि बेटा नहीं हुआ, तो आंसू! पशु दूध नहीं दे रहा, तो आंसू! दुकान में घाटा पड़ गया, तो आंसू! बच्चों के नम्बर कम आ गए, तो आंसू! लेकिन सोचो, ऐसा तो है नहीं कि आपके आंसुओं से उसके नंबर बढ़ जाएंगे।

आंसू बहाना गलत नहीं होता, लेकिन उसका रास्ता सही हो, तो ये आंसू भगवान से भी मिला देते हैं। वैराग्य अगर सही हो, ईश्वर का नाम लेते हो, सेवा करते हो, तो इस वैराग्य के रास्ते लोग मालिक को जल्दी पा लिया करते हैं।
… आई हुई सारी साध-संगत को बहुत-बहुत आशीर्वाद! आशीर्वाद!!

सवाल-जवाब

सवाल: काल्पनिक डर और अनिर्णय की स्थिति से कैसे बाहर निकला जा सकता है?

जवाब: आत्मबल के सहारे। डबल मार्इंड जब आप होते हैं, तो ईश्वर की भक्ति करें, जरूर आपको रास्ता मिलेगा।

सवाल: हर रोज आत्मा का दसवें द्वार पर असहनीय दबाव बढ़ते जाना किस बात का प्रतीक है?

जवाब: असहनीय दबाव कभी नहीं बढ़ता दसवें द्वार पे! वो आपके कर्मों की वजह से है। चलते-फिरते सुमिरन कीजिए, वो ठीक होगा।

सवाल: ओंकार क्या काल का नाम है?

जवाब: जी नहीं। ओंकार परमपिता परमात्मा का नाम है।

सवाल: सतलोक, अलखलोक, अद्मलोक, अनामी इन चारों लोकों को मिलाकर एक लोक और क्या बनता है?

जवाब: कोई लोक नहीं। ये जो लोक बताए गए हैं, जैसे-जैसे जीव भक्ति करते हैं, उस पदवी पे जाते हैं, वहां उसी तरह मालिक के दर्शन होते हैं।

सवाल: श्रीराम जी ने कहा था कि जननी और जन्मभूमि से बढ़कर कोई स्वर्ग नहीं होता। तो जो लोग दूसरे देशों में जाते हैं, वो कौन सा स्वर्ग देखने जाते हैं?

जवाब: मायारानी। और कोई स्वर्ग हमें नजर आया नहीं। कई बार मजबूरी भी होती है, क्योंकि यहां से उनको वो हासिल नहीं होता, जो बाहर से आसानी से हासिल हो जाता है।

सवाल: जो इन्सान सुमिरन करते-करते मालिक को प्यारा हो जाता है, उसका रूहानियत में क्या महत्व है?

जवाब: सुमिरन करते-करते जाना तो बहुत बड़ी बात है। कोई मालिक की याद में जाता है, तो उसके कर्म जो रूहानी मंडलों पे भोगने होते हैं, वो कट जाते हैं।

सवाल: मेरी मम्मी 30 दिसम्बर को चोला छोड़ गए थे। उसके बाद सपने में मम्मी कुछ कहते हैं, कभी कोई साधु आकर कहता है कि तुझे लेकर जाना है। मार्गदर्शन करें जी।

जवाब: आपका वहम् ही है। जिसने नाम लिया होता है, वो परमात्मा की गोद में बैठकर निजधाम बैठी है। और जो साधु-संत फिरते हैं पाखंडी, ये इनका बनाया साइको है। तभी आवाजें गूंजती रहती हैं। सो, उनके पांखडों में मत पड़ो और ऐसों को घर में घुसने ही मत दिया करो।

सवाल: पत्थरी के लिए आप जी ने पत्थर-चट लेने के लिए फरमाया था, उसका कैसे सेवन किया जा सकता है?

जवाब: इसके लिए यहां वैद्य जी हैं, उनसे आप मिल सकते हो। दूसरी बात, जिनके पत्थरी बनती है, वो ध्यान दें कि जिन चीजों में बीज होता है, जैसे टमाटर वगैरह, मत लो और पानी ज्यादा पीओ। जितना ज्यादा पानी पीओगे, पत्थरी नहीं बनेगी।

इसका पुरातन तरीका भी है कि एक लीटर पानी में 50-100 ग्राम दूध मिलाकर ‘कच्ची लस्सी’ बनाकर, वो पीओ, आगे गर्मी भी आ रही है, तो आप लगातार वो पीएं, तो गर्मी से भी बचत है और पत्थरी भी नहीं बनती। कम से कम
5-7 लीटर पानी हर रोज पीओ।