रूहानी सत्संग (26 फरवरी 2017) शाह सतनाम जी धाम, डेरा सच्चा सौदा, सरसा
बुराईयां त्यागें, जरूर बरसेगा महारहमोकरम :

मालिक की साजी-नवाजी प्यारी साध-संगत जीओ! सबसे पहले परमपिता परमात्मा को, सतगुरु-मौला को अरबों बार सजदा! महारहमो-करम दिवस, जो 28 फरवरी का होता है और आज साध-संगत उसे मना रही है, तो आई हुई साध-संगत को सच्चे मुर्शिदे-कामिल, दाता-रहबर के महारहमो-करम दिवस की बहुत-बहुत बधाई हो! बहुत-बहुत मुबारकबाद! सबके घरों में मालिक बरकतें डाले! खुशियां दे! और रूहानी तंदुरुस्ती, ताजगी दे, ये सतगुरु-मौला से दुआ करते हैं।

शाह सतनाम, शाह मस्तान जी दाता-रहबर जो रहमोकरम करते हैं, उसका मूल्य चुकाया नहीं जा सकता।

संत, पीर-फकीर सबका भला करने आते हैं, सबका भला करते हैं। कभी किसी को बुरा नहीं कहते, किसी का बुरा नहीं करते। इंसान जो मान लेता है, उसके घर में बरकतें आती हैं और जो नहीं मानता, नहीं सुनता वो अपने कर्माें के हिसाब से चलता रहता है। अच्छे कर्म बनाने के लिए सत्संग में आएं, इंसानियत के कारनामे करें, समाज का भला करें, सबका भला सोचें और मालिक से भला मांगे, तो अच्छे कर्म बनाए जा सकते हैं, अच्छे कर्म किए जा सकते हैं।

तो आप लोगों से यही गुजारिश है कि मुर्शिद-ए-कामिल का पाक-पवित्र महारहमोकरम दिवस जो आप मनाते हैं, इसे मनाएं वचनों पर अमल करके, इन्सानियत-सृष्टि की सेवा करके, अपने अदंर की बुराईयां निकालकर, तो महारहमो-करम जरूर बरसेगा। आपके ही नहीं, आपकी कुलों तक जाएगा। पर निर्भर आप पर करता है कि आप कितना अमल करते हैं! कितना वचनों को मानते हैं! चूंकि ये कलियुग है, इसमें कोई भी तोड़-मरोड़ कर कुछ भी पेश कर सकते हैं।

बात का बतंगड़ बनाना, गलत मीनिंग्स निकालना बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक का भी कोई भरोसा नहीं, कौन किस बात को कैसे बना दे! क्योंकि मन तो सबके अंदर जवान है। मन बूढ़ा नहीं होता। इंसान का शरीर साथ छोड़ देता है, शरीर कमजोर हो सकता है, लेकिन मन-जालिम हमेशा जवान रहता है। ज्यों-ज्यों इंसान बूढ़ा होता है, त्यों-त्यों ये जवान ही होता है। ये अंदर से ख्याल देता रहता है और इन्सान जो मन के गुलाम बन जाते हैं, वो बुरे कर्म करके मालिक से दूर हो जाते हैं।

शाह सतनाम जी दाता-रहबर का महारहमो-करम दिवस जिस तरीके से मनाया जाए, अल्फाज कम पड़ जाते हैं। सतगुरु-मौला ने हम पर महापरोपकार (महारहमो-करम) किया, हमें अल्लाह, वाहेगुरु, राम, सतगुरु-मौला मिला दिया।

कैसे शुक्राना करें! कैसे सजदा करें! सब चीजें छोटी पड़ जाती हैं शाह मस्तान, शाह सतनाम जी के लिए! लेकिन फिर भी अरबों बार सजदा करते हैं! नमन करते हैं अपने मुर्शिद-ए-कामिल को, जिसने करोड़ों का घर संवार दिया और संवार रहे हैं। हम तो चौकीदार हैं, हमारा काम तो आवाज देना है, और वो आवाज भी शाह सतनाम जी ही दिलवाते हैं! ऐसे हम कह दें कि हम कुछ करते हैं, सवाल ही पैदा नहीं होता!

‘करै-करवै आपे आप’, वो खुद ही कर रहे हैं, जो भी उन्होंने करना है, जो भी किया है, जो भी करेंगे। लेकिन एक बात जरूर है कि समाज से बुराइयां हटानी हंै और अच्छाईयों को बढ़ावा देना है। रास्ता बड़ा मुश्किल है, लेकिन चलना होगा एकजुट होकर। मशाल जलाने का समय है, वो जलानी पड़ेगी समाज को जगाने के लिए।

जिन लोगों के दिमाग गंदे हो चुके हैं, उनका कोई धर्म-मजहब नहीं होता। जो बुरे कर्म करते हैं, निर्दोषों को जो मारते हैं, उनकी कुलें डूबती हैं! वो नर्क में जाते हैं! लेकिन यहां पहले नर्क भोगते हैं। दूसरी तरफ, जो मालिक से प्यार करते हुए इस दुनिया से जाते हैं, मालिक उन्हें गोद में बिठाकर निजधाम सचखण्ड, सतलोक, अनामी लेकर जाते हैं।

उन्हें कई गुणा बड़ा दर्जा मिलता है। दु:ख जरूर लगता है, जब कोई इन्सान छोटी उम्र में चला जाए, या गलत तरीके से कोई इन्सान चला जाए! क्योंकि जुल्म सहना भी गलत है, करना तो बेहद गलत है! तो राम का नाम जपें, भक्ति-इबादत करें, मालिक शक्ति देगा, वो रास्ता दिखाएगा, तो ही बुराई करने वाले बुराईयों से बाज आ सकते हैं!

बुराईयां इस समाज से हट सकती हैं, अन्यथा बुराई का बीज ऐसा पड़ा हुआ है कि वो अपने मां-बाप, परिवार, खानदान से कोई ताल्लुक नहीं रखते। उनका काम गंदगी बोलना, गंदगी लिखना, गंदगी पे चलना है। …तो शाह सतनाम, शाह मस्तान जी से यही दुआ है कि हे सच्चे मुर्शिदे कामिल! आप रहमोकरम के दाता हैं, आप अपने बच्चों पर ऐसी रहमत बरसाएं कि ये पूरे समाज से गंदगी साफ कर दें, बुराईयों को दूर कर सकें, ऐसी इनको हिम्मत बख्श, ऐसी इनको शक्ति बख्श! और वो बख्श देते हैं! ये प्यार-मोहब्बत का रास्ता है, हिम्मत से बढ़ते जाना है, तो समाज एक दिन जरूर उस ओम, हरि, अल्लाह, वाहेगुरु, गॉड, खुदा, रब का नाम लेगा, जो हमें शाह सतनाम जी, शाह मस्तान जी दाता ने बताया है।

शाह सतनाम जी दाता का रहमोकरम लिख-बोल कर बताया नहीं जा सकता। सतगुरु, मुर्शिदे-कामिल वो दाता रहबर हैं, अगर कहें कि क्या सूरज की किसी से तुलना हो सकती है? हो सकता है कि माइक्रोस्कोप, दूरबीन के द्वारा ऐसे ग्रह मिल जाएं, ऐसे सूरज मिल जाएं, जो सूरज जैसे ही हों, लेकिन वैसे खुली आंखों से देखें, तो चंद्रमा क्या, पृथ्वी क्या, किसी की भी तुलना नहीं हो सकती! सोचने वाली बात कि सूरज की तुलना नहीं हो सकती, मालिक की बनाई हवा, आकाश तत्व की तुलना नहीं हो सकती, तो उस परमपिता परमात्मा की तुलना किससे करें और कैसे करें!

वो तो एक था, एक है और एक ही रहेगा। और हमें उस तक जो लेकर गए, जिस रूप में वो नजर आया, वो ‘शाह सतनाम’, ‘शाह मस्तान’ हैं! हम उनकी तुलना किसी से कर ही नहीं सकते! लिख-बोल कर बता नहीं सकते! उन्होंने खुद ही बोला कि ‘हम थे, हम हैं, हम ही रहेंगे।’ जो इस बात को सही तरीके से मानते हैं, खुशियां असल में मिलती ही उनको हैं! जो सही तरीके से, सही भावना से सतगुरु-मौला को नहीं मानते, सिर्फ दिखावा-मात्र है, तुलना के चक्कर में उलझे रहते हैं, वो कुछ हासिल नहीं कर पाते।

सुमिरन करना बहुत जरूरी है। कोई छोटा, कोई बड़ा, कोई कैसा भी क्यों न हो, जब तक सुमिरन नहीं करोगे, तब तक मन काबू नहीं आएगा। आधा घण्टा या पंद्रह मिनट सुबह-शाम आप सुमिरन करें और करेंगे तो नजारा जरूर मिलेगा। चाहे आप कुछ भी क्यों न हों, जब तक सुमिरन नहीं करते, आपका मन आपके काबू में नहीं रहेगा। तरह-तरह की बातें आपके दिलो-दिमाग में आती रहेंगी।

जिसने अपने विचारों पर कंट्रोल कर लिया, वो दुनिया का सबसे सुखी इंसान बन जाता है। विचारों पर कंट्रोल करना, ये मामूली बात नहीं! विचारों पर कंट्रोल नहीं, तो कम से कम अपनी बुराईयों, बुरी आदतों पर कंट्रोल कर लो। कहने का मतलब कि बुरे कर्म ना करो, तो भी आप बहुत भाग्यशाली हैं। बुरी सोच आ गई, लेकिन उस सोच के अकॉर्डिंग गलत काम नहीं किया, तो भी सही है। क्योंकि दिमाग में सोच तो चलती रहती है।

बहुत लोग ऐसे हैं जिनकी अच्छी सोच चलती है। ऐसे लोग भी हैं, जिनकी बुरी सोच चलती है। किसी के 70 प्रसेंट अच्छी, किसी के 80 प्रसेंट अच्छी, तो किसी के 90 प्रसेंट अच्छी सोच चलती है, पर 10, 20, 30 प्रसेंट बुरी सोच भी चलती रहती है। कई ऐसे भी होते हैं, जिनके 20-30 प्रसेंट अच्छी और बाकी सब बुरी सोच चलती है! तो सोच कैसी भी चलती हो, बुरी सोच आ गई, उसके अनुसार काम ना करो, तो भी पापों के भागीदार नहीं बनोगे और सुखों से आपका दामन भरता जाएगा।

सेवा और सुमिरन ही ऐसा तरीका है, जिससे आप बुरे विचारों पर कंट्रोल कर सकते हैं, अन्यथा ये मन काबू नहीं आता। ये तो बेलगाम घोड़ा है, दौड़ता रहता है। तो शाह सतनाम जी दाता ने हमें इस बेलगाम घोड़े को लगाम डालने के लिए गुरुमंत्र, राम का नाम बताया। अब ये आप पर निर्भर है कि आप राम का नाम लेते हैं या नहीं! भक्ति करते भी हैं या नहीं! अगर भक्ति करेंगे, तो धीरे-धीरे विचार कंट्रोल में आने शुरू हो जाएंगे और आप सुखी होते जाएंगे।

‘सतगुरु का हूं’, कहना आसान है, ‘सतगुरु की मानता हूं’ ये बात बहुत बड़ी है। सतगुुरु के तो आप हो, जब भक्ति में बैठ गए, नाम में बैठ गए, आप चाहे बनो या न बनो, सतगुुरु ने अपना बना लिया है और वो दोनों जहान में अपना बना कर रखेगा! जिंदगी का मजा लेना चाहते हो, आनंद-लज्जत से मालामाल होना चाहते हो, तो सतगुरु की माननी भी शुरू कर दो। जब तक मानोगे नहीं, खुशियां नहीं आएंगी।

इसलिए पीर-फकीर हमेशा कहते हैं कि आप सेवा-सुमिरन करो, लेकिन साथ में मालिक का नाम जपो। गुरु के हो, लेकिन गुरु की मानने लग जाओगे तो पता चलेगा कि आप कितने भाग्यशाली हैं! और कैसे परमानंद से आप वंचित रह रहे थे! आप तो भूले फिरते थे! परमात्मा ने कितने परमानंद, कितनी लज्जत, कितना स्वाद, कितना नशा भर दिया आपके दिमाग में! आप सोचेंगे कि मैंने जिंदगी यूं ही बर्बाद कर दी चुगली-निंदा में, ईर्ष्यावादी में, क्यों बर्बाद कर दी? ये तभी पता चलेगा, जब आप सेवा और सुमिरन लगातार करेंगे। संत, पीर-फकीर के वचनों पर सौ प्रसेंट अमल करेंगे!

शाह सतनाम, शाह मस्तान जी दाता का महापरोपकार है। आप में पता नहीं कितने लोग होंगे, जो बीमारियों से जूझ रहे थे! नशे की बीमारियों से जूझ रहे थे! जुआ खेलते थे! मांसाहार में लगे हुए थे! वेश्यावृत्ति में लीन थे! और फिर कैसे परमपिता परमात्मा सतगुरु ने रहमोकरम किया कि आज मालिक की निगाह में सबसे अव्वल बन गए! राई से पहाड़ रूहानियत में बनना कोई छोटी बात नहीं होती!

तो दाता रहबर ने सबको राई से पहाड़ बनाया रूहानियत का, इंसानियत का, मालिक के प्यार का, खुशियों का। और जिसने भी शुक्राना किया, वो खुशियां लगातार बरकरार रहीं और मिलती ही रहेंगी। आपको यह भी बता दें कि कलियुग जितने जोर-शोर से बढ़ रहा है, उस राम के दया-मेहर, रहमत की स्पीड भी हजारों गुना ज्यादा बढ़ रही है।

सजदे से झोली भर सकती है, अगर सच्चे दिल से सजदा किया है। बताइये, कितना आसान! थोड़ा-सा ही सुमिरन कर लो, चाहे अनमने मन से कर लो, तो भी दरगाह में मंजूर हो जाएगा। चलते-फिरते, बैठते, चाहे मजबूरी में ही कर लिया, तो मालिक फिर भी फल बख्शेगा ही बख्शेगा। और कहीं लग्न लगाकर बैठ गए, तो दसवां द्वार खुलेगा ही खुलेगा! और मालिक के नूरी स्वरूप के दर्श-दीदार अवश्य होंगे। अब ये तो आपके हाथ में है, आप कैसा करते हैं!

चुगली-निंदा से हमेशा बचकर रहें, परमपिता परमात्मा की तो बिल्कुल भी निंदा न करें। लोग पता नहीं कैसे हैं आज के दौर में…, हालांकि कलियुग है, जरा सी किसी से लड़ाई हुई, तो फिर जो गाते हैं उसकी, सारी अगली-पिछली एक कर देते हैं। दो दिन बाद फिर दोस्ती हो जाती है। फिर शर्मिंदा नहीं होते! बल्कि प्यार बढ़ जाता है। सुनने वाला सोचता है कि कल तो इसकी इतनी बुराईयां गा रहा था, आज ये घी-खिचड़ी बन गए!

यही है कलयुग और कलियुगी इसांन। जब तक हां में हां है, बहुत अच्छा, वरना कमजोरियां एक-दूसरे की टेप करते रहते हैं, ताकि जब लड़ाई हो, तो गानी शुरू कर देते हैं! ये बिल्कुल गलत है। कभी किसी को बुरा ना कहो। कभी किसी की बुराई ना गाओ। अपने अंदर की बुराइयों को निकालो राम-नाम से। आप यह मौका मत ताड़ो कि कब बुराई करूं! बल्कि ये मौका ढूंढो कि कब अच्छाई करूं! मौका की ताड़ में रहो, ताकि अच्छे कर्म करो। दूसरों को देखकर जला मत करो। ये सब मन की खुराक है। ये सही नहीं हैं।

पीर-फकीर को जब सतगुुरु-मौला कहते हैं, तब ही वो आशीर्वाद देतें हैं। और परमात्मा का आशीर्वाद एक त्रिलोेकी में नहीं, बल्कि सैकड़ों त्रिलाकियों में जाता है! जबकि आप ये मान लेते हो कि मुझे नहीं दिया! उसको दिया! कई तो एक-दूसरे के पीछे बैठते ही इसलिए हैं कि उसको देखा, तो कम से कम हम पर भी निगाह पड़ जाएगी! कमाल है आपकी ये थ्यूरी!

ये सौ प्रसेंट गलत है। क्योंकि पीर-फकीर हमेशा मालिक से सबके लिए दुआ की निगाह मांगते हैं कि मालिक, सबका भला कर! सबके घरों में बरकतें डाल! सबके घरों में खुशियां बख्श! हर कोई सुख-चैन की जिंदगी जी सके, परमानन्द ले सके, ऐसा रहमो-करम कर कि तेरी भक्ति करके तेरी रहमत से मालामाल हो सके!

…आई हुई सारी साध-संगत को बहुत-बहुत आशीर्वाद! आशीर्वाद!! —::::—