बेटा! तुसीं इक मंगदे सी, दो दित्ते :

सत्संगियों के अनुभव पूज्य सतगुरु परम पिता जी की रहमत
बहन राजरानी इन्सां पत्नी कन्हैया लाल इन्सां सुपुत्र श्री नादरराम वार्ड नं. 5 रानिया जिला सरसा (हरियाणा)।
परम पूजनीय सतगुरु परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज की दया-मेहर का करिश्मा बहन लिखित रूप में इस प्रकार बताती है। बहन अपने पत्र में लिखती है कि मेरी शादी 1976 में रानिया में मुन्शी राम सुपुत्र नादर राम के साथ हुई थी। लगभग एक साल के बाद यानि 1977 में मेरे पति की मृत्यु के बाद मैं अपने मायके में आकर रहने लगी थी।

उपरान्त बिरादरी वालों की पंचायत ने दोनों परिवारों में सहमति बनाकर मुझे मुन्शी राम के छोटे भाई कन्हैया लाल के लड़ लगा दिया। शादी के बाद हम दोनों पति -पत्नी रूटीन में सुमिरन करते और सतगुरु प्यारे से हर पल (सुमिरन करने के बाद) अरदास भी करते कि पिता जी, हमें एक बेटे की दात बख्शो जी ताकि हमारी वंश आगे बढ़ सके।

कुल मालिक के सच्चे दरबार (पूज्य पावन हजूरी) में हमारी दुआ कबूल हुई। सच्चे मुर्शिदे कामिल ने फरमाया, ‘बेटा तुसी’ इक मंगदे सी, दो दित्ते।’’
मैं दरबार में पंडाल की पक्की समिति में अपना नाम दर्ज करवा कर पंडाल समिति में सेवा करने लगी और मेरा पति (कन्हैया लाल) लंगर समिति में रैगुलर सेवा करने लग गया। एक बार जब मैं गर्भवती थी, अचानक मेरे अंदर शरीर में बहुत ज्यादा कमजोरी रहने लगी। खाया-पीया भी नहीं पचता था।

मुझे अंदर ही अंदर चिंता सताती कि पता नहीं संतान (बच्चा) कैसी होगी। (यह तो पक्का यकीन था कि होगा तो बेटा ही पर कहीं मेरी बीमारी का असर बच्चे पर न पड़े, कहीं वह भी…) परंतु सच्चे दाता जी ने एक दिन मेरा यह भ्रम भी दूर कर दिया। पूज्य शहनशाह जी ने मुझे राजा-महाराजाओं वाली शाही ड्रैस पहने हुए दर्शन दिए और फरमाया, ‘बेटा, ऐसा ही होगा।’ और इस प्रकार पूज्य सतगुरु परम पिता जी की अपार रहमत से दिनांक 20 सितम्बर 1982 को हमारे घर एक स्वस्थ बच्चे ने जन्म लिया और दूसरा बेटा 15 जुलाई 1984 को पैदा हुआ।

मालिक की रहमत हो और जीव की नियत साफ हो तो सतगुरु कमी कभी कोई आने ही नहीं देता। मांगा था हमने एक, सतगुरु परम पिता जी ने खुश होकर हमें दो बेटे बख्शे हैं। सतगुरु पिता जी की अपार रहमतों का वर्णन कोई कर ही नहीं सकता।

पूजनीय डॉ. एमएसजी लायनहार्ट पिता जी के वचनानुसार कि धरती का कागज, वनस्पति की कलमें, सभी पर्वतों को समुंद्रों में घोल के स्याही बना लो और पवन लिखारी इतनी (वायु की) तेज गति से लिखने बैठ जाए, सब कुछ खत्म हो जाएगा परंतु सतगुरु के गुण फिर भी पूरे नहीं लिखे जा सकेंगे।

मालिक की महिमा का कहां तक वर्णन करूं। पिता जी आप जी धन्य-धन्य हैं जो पूज्य मौजूदा गुरु डॉ. एमएसजी पिता जी के स्वरूप में आप जी अपने जीवों की पल-पल संभाल करते हैं।