सत्संगियों के अनुभव :-  पूजनीय बेपरवाह मस्ताना जी महाराज ने करवाई सोझी

‘‘ यह रुपए हराम के थोड़े ही हैं ’’

तू गरीब आदमी है, यह सौ रुपया तू अपने घर काम में प्रयोग कर लेना। हालांकि वह आदमी पूज्य शहनशाह जी द्वारा दिए जा रहे सौ रुपए लेना नहीं चाहता था कि बेपरवाह मस्ताना जी महाराज कहीं फिर न पीटें कि तू रुपए देकर क्यों नहीं आया, दयालु पिता जी ने अपनी दया-मेहर से उसे विश्वास दिलाया कि ‘भई, तू अब डर ना।

बेपरवाह जी से हम तुझे माफी दिला देंगे। हम उन्हीं की रजा से ही ये रुपऐ (सौ रुपया) तुझे वापस दे रहे हैं कि घर के काम में खर्च लेना। बेपरवाह जी अब तुझे कुछ नहीं कहेंगे।’

प्रेमी बन्ता सिंह महराजका गांव श्री जलालआणा साहिब जिला सरसा। प्रेमी जी सच्चे सतगुुर के रहमोकरम का एक अद्भूत व बहुत ही मर्म-स्पर्शी घटना का वर्णन इस प्रकार करते हैं।

घटना लगभग वर्ष 1962 की है। श्री बन्ता सिंह जी ने लिखित में बताया कि एक दिन मैं पूजनीय परम पिता जी के एक सीरी-सांझी के घर पर गया। वह आदमी पूज्य परम पिता जी से (डेरा सच्चा सौदा में गुरगद्दी पर विराजमान होने से पहले) कुछ रुपए उधार ले गया था और उसने वापस नहीं मोड़े थे। पूज्य शहनशाह जी डेरा सच्चा सौदा में चले गए हैं, शायद वह पैसे मुकर ही न जाए।

मैनें उस व्यक्ति को पूज्य परम पिताजी से उधार में लिए पैसे वापस लौटाने को कहा कि जो भी पैसे तूने उधार लिए हैं, वो लौटा कर आ। वह आदमी तो सचमुच ही मुकर गया। कहने लगा कि मैंने तो पूज्य पिता जी से लिया उधार चुकता कर दिया था। एक पाई भी मेरी तरफ बकाया नहीं है।

उसके बेइमान मन ने उसे पैसे मुकर जाने को उकसा दिया था कि शाही परिवार में किसी भी और को क्या पता चलना है, कह देंगे कि मैंने तो दे दिए थे।

प्रेमी जी ने बताया कि उसके लगभग दो साल बाद यानि वर्ष 1962 में एक दिन वह आदमी (वह सीरी-साझी नौकर) हमारे घर पर आया। वह बहुत ज्यादा परेशानी की हालत में था, मानों उसके दिमाग पर भारी बोझ हो। वह बहुत ही दीन-भाव से कहने लगा कि बंता सिंह मेरे साथ संतों (पूज्य परम पिता जी) के पास डेरा सच्चा सौदा में चल।

मेंने उससे कहा कि ऐसा क्या काम है। कहने लगा कि काम है तो ही आया हूं। मैंने उससे कहा कि कोई बात नहीं एक-दो दिन में चलेंगे। कहने लगा एक-दो दिन! नहीं भाई, आज और अभी ही चलना है। और उसने अपने साथ बीती उस रात की सारी घटना रो-रो के सुना दी कि उस रात जिस दिन मैंने तुझे यह कहा था कि मैंने एक पाई भी पूज्य परम पिता जी की नहीं देनी है, पूज्य बेपरवपाह मस्ताना जी महाराज मेरे पास साक्षात रूप में प्रकट हुए और दे सोटी पर सोटी, मेरे को खूब पीटा! कहते कि कुत्ते! ये रुपए हराम के थोड़े ही हैं? दो साल हो गए तैंने पैसे लौटाने की कोई बात ही नहीं की और बल्कि अब कह रहा है कि मैंने एक पाई भी नहीं देनी।

आज यदि रुपये नहीं लौटाए तो दोबारा फिर ऐसी गत तेरी बनाएंगे कि जीने योग्य भी नहीं रहेगा। बंता बाई जी, बाबा जी ने मार-मार के मेरे पासे भन्न दिए हैं। रुपए आज नहीं लौटाए तो कल फिर …।

रुपयों का इंतजाम जैसे-तैसे करके मैं लाया हूं। उसकी इस स्थिति पर मुझे भी दया आ गई। और उसे अपने साथ लेकर मैं डेरा सच्चा सौदा में पहुंच गया। शहनशाह जी की आज्ञा पाकर हम पूज्य शहनशाह पिता जी से मिले। पूज्य शहनशाह परम दयालु पिता जी ने हमारी राजी खुशी पूछते हुए तेरावास में आने का प्रयोयन पूछा कि सुना भाई, कैसे दर्शन दिए है? उस भाई ने अर्ज की सच्चे पातशाह जी, मैंने आप जी से पांच सौ रुपए उधार लिए थे, वो रुपए देने आया हूं।

सच्चे पातशाह जी ने उस भाई से कहा कि ‘भाई, हमने तो तेरे से रुपए मांगे ही नहीं है। उस भाई ने क्षमा याचना भाव से अर्ज की, सच्चे पातशाह जी, मैं कौन सा अपने आप देने वाला था, मैं तो मुकर गया था कि मैंने तो कोई पैसा नहीं देना है, यह तो बेपरवाह मस्ताना जी महाराज ने दबकाया है और अपनी सोटी से खूब पीटा है कि रुपए हराम के थोड़े ही हैं।

उसने पांच सौ रुपये अपनी जेब से निकाल कर पूज्य शहनशाह जी के पवित्र चरण-कमलों में रखते हुए विनम्रता से विनती की, बाबा जी अपने पैसे संभाल लीजिए जी तो यह देखकर परम दयालु दातार जी ने अपने दयालु स्वभाव से उन रुपयों में से सौ रुपया उठाकर उस भाई को वापस देते हुए फरमाया, तू गरीब आदमी है, यह सौ रुपया तू अपने घर काम में प्रयोग कर लेना। हालांकि वह आदमी पूज्य शहनशाह जी द्वारा दिए जा रहे सौ रुपए लेना नहीं चाहता था

कि बेपरवाह मस्ताना जी महाराज कहीं फिर न पीटें कि तू रुपए देकर क्यों नहीं आया, दयालु पिता जी ने अपनी दया-मेहर से उसे विश्वास दिलाया कि ‘भई, तू अब डर ना। बेपरवाह जी से हम तुझे माफी दिला देंगे। हम उन्हीं की रजा से ही ये रुपऐ (सौ रुपया) तुझे वापस दे रहे हैं कि घर के काम में खर्च लेना। बेपरवाह जी अब तुझे कुछ नहीं कहेंगे।’ और वो चार सौ रुपऐ मैंने पूज्य शहनशाह जी के आदेशानुसार उस मौके के जिम्मेवार डेरा प्रबंधक के पास जमा करवा दिए।

इस प्रकार सच्चे सार्इं बेपरवाह मस्ताना जी महाराज ने पूज्य परम पिता जी की हक-हलाल, मेहनत की कमाई के रुपए उस व्यक्ति से उसके बेईमान मन पर दबिश देकर उसे वापस लौटाने पर मजबूर किया और अपना दया-भाव दर्शाते हुए उसे क्षमादान भी बख्शा।