मूली की काश्त से मिले अधिक लाभ
मूली पूरे भारत में उगाई जाने वाली सब्जी की जड़ वाली प्रमुख फसल है। यह गृहवाटिका के लिए भी उपयुक्त सब्जी की फसल है जो बिजाई के बाद लगभग छ: से सात सप्ताह में तैयार हो जाती है। मूली के फलों को पकाकर सब्जी के रूप में खाया जाता है तथा इसके पत्ते हरी पत्तेदार सब्जी के रूप में पकाकर खाए जाते हैं जो खनिज लवणों व विटामिन ए और सी से भरपूर होते हैं। किसान उन्नत क्रियाओं को अपनाकर मूली की काश्त करके कम लागत व कम समय में अधिक लाभ कमा सकते हैं।

उन्नत किस्मों का करें चुनाव:

मूली की पूसा चेतकी किस्म ग्रीष्म व वर्षाऋतु की फसल के लिए उपयुक्त किस्म है। इसकी औसत पैदावार 60 क्विंटल प्रति एकड़ है। इसके अलावा पंजाब सफेद नामक देशी किस्म की डाड़े लगभग 30-40 सेमी लम्बी नर्म तथा बर्फ की तरह सफेद रंग की होती है जिसकी औसत पैदावार 80 क्विंटल प्रति एकड़ है। हिसार खेती (हिसार सलेक्शन-1) अगेती किस्म की औसत पैदावार 120 से 140 क्विंटल प्रति एकड़ है। इसकी डाड़ो की खुदाई बिजाई के 60-65 दिन बाद भी की जाए तब भी ये खाने योग्य रहती है।

इन किस्मों के अलावा जापानीज व्हाइट किस्म पछेती बिजाई के लिए उपयुक्त एशियाई किस्म है। इसकी जड़े भी बर्फ की तरह सफेद रंग की होती है जिसकी औसत पैदावार 80 क्विंटल प्रति एकड़ है। व्हाइट आइसिकिल एक यूरोपियन किस्म है जो 35-40 दिन में तैयार हो जाती है। 30-40 क्विंटल प्रति एकड़ की औसत पैदावार वाली इस किस्म की बिजाई ठण्डे मौसम में करनी चाहिए।

खेत की सही तैयारी करके समय पर करें बिजाई :

मूली की काश्त के लिए खेत को अच्छी तरह से तैयार करने के लिए खेत की दो-तीन गहरी जुताइयां करनी चाहिए व प्रत्येक जुताई के बाद पाटा लगाएं ताकि खेत में उचित नमी बनी रहे तथा ढेले टूट जाएं। मूली की देशी किस्मों की बिजाई अगस्त से सितम्बर तथा यूरोपियन किस्मों की बिजाई अक्टूबर से नवम्बर तक करनी चाहिए। एक एकड़ के लिए तीन कि.ग्रा. बीज पर्याप्त होता है।

फसल की अच्छी पैदावार व गुणवत्ता के लिए बिजाई हल्की मेढ़ों पर करनी चाहिए जो सीधी व एक समान ऊंची हो तथा उनकी दोनों तरफ से भराई कर देना चाहिए। मेड़ों की चोटियों पर दो से तीन से.मी. गहरी नाली बनाकर बीज बोना चाहिए। औसत दर्जे की जमीन के लिए प्रति एकड़ में जुताई करते समय 20 टन गोबर की खाद व लगभग एक बोरी यूरिया और आधा बोरी डीएपी खाद बिजाई के समय प्रति एकड़ के हिसाब से डालनी चाहिए।

सही समय पर करें सिंचाई:

मूली की बेहतर पैदावार लेने के लिए तीन-चार बार सिंचाई करने की आवश्यकता होती है। अगर बिजाई के समय खेत में नमी कम हो तो पहली सिंचाई बिजाई के तुरंत बाद करनी चाहिए। सिंचाई के समय पानी मेड़ों के तीन चौथाई भाग से ऊपर नहीं आना चाहिए। बाद की स्थितियां मौसम व भूमि की नमी अनुसार 12 से 15 दिन के अंतर पर करना चाहिए। मूली की फसल में खरपतवार नियंत्रण के लिए दो या तीन बार निराई-गुड़ाई करनी चाहिए। पहली गुड़ाई बिजाई के दो तीन सप्ताह बाद करके मिट्टी चढ़ानी चाहिए तथा दूसरी व तीसरी गोड़ाई आवश्यकतानुसार करनी चाहिए।

फसल की खुदाई:

मूली की जड़ों की खुदाई करने की अवस्था फसल व किस्म पर निर्भर करती है। जड़ों की मुलायम अवस्था में खुदाई करनी चाहिए। प्राय: देशी किस्में देर से तैयार होती हैं तथा यूरोपियन किस्में जल्दी तैयार हो जाती हैं।

कीट व रोगों की रोकथाम:

मूली की फसल में चेपा नामक कीट के शिशु व प्रौढ़ पत्तियों से रस चूसकर हानि पहुंचाते हैं। इस कीट के नियंत्रण के लिए कीट का आक्रमण शुरू होने पर कीटग्रस्त टहनियों को तोड़कर नष्ट कर देना चाहिए। इसके अतिरिक्त 250-400 मिलीलीटर मिसाइल डेमेटान 25 ईसी या डाइमेथोएट 30 ईसी को 250-400 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में छिड़कना चाहिए।

ंिसगरों (मूली के फल) के लिए उगाई गई फसल पर 250-400 मिलीलीटर मैलाथियान 50 ईसी को 254-400 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में छिड़कें। इस प्रकार उन्नत शष्य क्रियाओं को अपनाकर किसान मूली की काश्त से अधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
– खुशवीर मोठसरा

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