पूज्य डॉ. एमएसजी हजूर पिता जी की दया-मेहर,‘‘खुशियां तो बहुत आती हैं, पर…।’’

सत्संगियों के अनुभव

सतगुरु जी की अपार रहमत का उपरोक्त अनुसार वर्णन 29 अप्रैल 2008 का है। बहन आशा इन्सां पत्नी प्रेमी प्रताप इन्सां निवासी शाह सतनाम जी नगर सरसा, अपने एक पत्र में लिखित रूप में इस प्रकार बताती है।

वह लिखती है कि मैंने
सन् 1986 में डेरा सच्चा सौदा शाह सतनाम जी आश्रम- बरनावा (यूपी) में पूज्य परम पिता जी से नाम शब्द लिया। नाम शब्द लेने से पहले मैं काफी समय से देखा व महसूस किया करती कि डेरा सच्चा सौदा से नाम लेवा घरों और परिवारों का नजारा स्वर्ग की भांति है। जहां ना कोई नशा है, न मांस-मिट्टी, न कोई फालतू की निंदा चुगली और न ही कोई फिजूल की बातें या बहसबाजी है। जहां पर हर समय राम-नाम की बात या फिर अपना अपना कार्य करना ही मुख्य है। न किसी के पास ज्यादा बैठना, न कोई बुरी आदत।

मुझे ये सब देखकर बहुत अच्छा लगता कि हम भी नाम शब्द जरूर लेंगे। और मेरी यह दिली इच्छा सन् 1986 में पूरी हुई। उपरान्त मैंने साथ में यह भी प्रण किया कि दूसरे लोगों को भी ज्यादा से ज्यादा नाम-शब्द दिलाकर उनके घर भी अपनी तरह स्वर्ग जैसे बनाऊंगी। सतगुरु जी की रहमत से अपने मायका परिवार के बहन-भाई, भाभी, माता पिता व अन्य सखी-सेहलियों को प्रेरित कर नाम शब्द दिलाया और इसी तरह अपनी ससुराल वालों के भी कई सदस्यों को डेरा सच्चा सौदा से जोड़ा है और पूज्य पिता जी ने भी खुशियों की कमी नहीं रहने दी। मालिक ने मेरी हर इच्छा अपनी रहमत से पूरी की और कर भी रहे है।

उपरोक्त वर्णन 29 अप्रैल 2008 का है। उस दिन मैं शाह मस्ताना जी धाम में रोजाना की तरह पहरे की ड्यूटी पर थी। अचानक मन में बैठे-बैठे ख्याल आ गया कि पूज्य मौजूदा गुरु जी संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां (डॉ. एमएसजी) अक्सर सत्संग में सेवादारों के लिए यह भी वचन करते हैं कि सेवादारों को सुमिरन व सेवा का फल अवश्य मिलता है और मैं तो आज वो फल लेकर ही घर जाऊंगी। मैं सोच रही थी कि देखो, पिता जी क्या फल देते हंै।

मेरी पहरे की ड्यूटी 9 बजे तक थी, शिफ्ट वाली मेरे साथ की अन्य सेवादार बहनें तो अपने समयानुसार चली गई, पर मैं इस जिद में बैठी रही कि फल तो पिता जी से आज लेकर ही जाना है।

उसी दौरान वहां एक बहन आई, वह मेरी जान पहचान की ही थी। उसने जिक्र-जिक्र में बताया कि मेरी शादी पर पूजनीय परम पिता जी ने मुझे यह पांच रुपये का सिक्का शगुन में दिया था। उसने वो शाही सिक्का भी मुझे दिखाया। उसने यह भी बताया कि मेरी शादी पूज्य परम पिता जी की पावन हजूरी में ही हुई थी। उसकी बात सुनकर मेरे अंदर भी यह ख्याल बार-बार उठे कि काश! मेरी शादी भी पूज्य परम पिता जी की हजूरी में हुई होती तो मुझे भी पूज्य शहनशाह जी शगुन में सिक्का प्रदान करते और मैं उसे अपने पास खजाने में संभाल कर रखती।

अचानक मुझे यह भी ख्याल आया कि पूज्य पिता जी संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां आज जरूर मुझे सिक्का बख्शेंगे, और सिक्का लेकर ही मैं घर जाऊंगी। इस तरह मन में बातें करते और सोचते करते रात्रि का डेढ़ बज गया। इतने में सेवादारों के लिए प्रसाद आ गया।

वर्णनीय है कि आज रूहानी स्थापना दिवस (डेरा सच्चा सौदा का स्थापना दिवस एवं जाम-ए-इन्सां गुरु का दिवस) का भंडारा मनाया गया और सारी साध-संगत में सर्व धर्म संगम प्रसाद बांटा गया और ईलाही खजाना (एक-एक रुपये का सिक्का) भी, जिन्हें पिछले भंडारों पर नहीं मिला था।

जितने भी सेवादार मौके पर शाह मस्ताना जी धाम में मौजूद थे, सभी को सारे धर्मों का सांझा प्रसाद का एक-एक लिफाफा दिया गया। मैंने जब लिफाफा खोला तो प्रसाद में एक रुपये का सिक्का (ईलाही खजाना) भी था। मेरे आश्चर्य की तब कोई हद नहीं रही, जब मैंने सिक्के पर साल 1982 अंकित देखा।

मेरी शादी 1982 में हुई थी, और जो मैंने मांगा था कि अगर मेरी शादी भी पावन हजूरी में होती है तो मुझे भी पूज्य पिता जी शगुन का सिक्का प्रदान करते और पूज्य पिता जी की वो ही दात आज मुझे मिल गई। दात पाकर मैं बहुत-बहुत खुश थी और इतनी खुशी कि संभाले नहीं संभालती थी।

मैंने वो सिक्का (पूज्य गुरु जी की दात) अपने साथ वाली सभी सेवादार बहनों को दिखाया और बताया कि पूज्य पिता जी ने मुझे मेरी शादी का शगुन दिया है। मैंने उन बहनों से भी पूछा कि क्या तुम लोगों के प्रसाद में भी एक रुपये का सिक्का है? सभी ने ‘नहीं’ में जवाब दिया कि हमारे प्रसाद वाले लिफाफे में तो नहीं है।

मैंने वो ईलाही खजाने का सिक्का घर आकर एक डिब्बे में संभाल कर रख दिया। सुबह दिन में जब मैंने डिब्बा खोला कि यह खुशी परिवार वालों को भी बताऊं तो मुझे डिब्बे में सिक्का नहीं मिला। सिक्का न मिलने पर मेरे होश उड़ गए कि यह क्या भाणा वरत गया। सिक्का गया तो गया कहां। एक दम उदासी छा गई तथा परेशानी और बढ़ गई।

उपरान्त मैंने पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की पावन हजूरी में क्षमा याचना करते हुए अपनी परेशानी का कारण बताया कि पिता जी आप जी ने दात रूप में जो खजाना (एक रुपये का सिक्का) मुझे प्रसाद में बख्शा था, वह मैंने घर पे डिब्बे में संभाल कर रख दिया था, और अगले दिन सुबह देखा तो गायब था, मेरे से शायद यह भारी गलती हो गई है कि मैंने वो इलाही खुशी सभी को बता दी थी।

पिता जी मुझे क्षमा कीजिए और खुशियां प्रदान कीजिए।

सच्चे पातशाह जी ने हंसते-मुस्कुराते हुए वचन फरमाया ‘बेटा! खुशियां तो बहुत आती हैं पर तू उलटी दे (वापिस लौटा) देती है। मैंने पूज्य पिता जी से दोबारा फिर क्षमा मांगी कि पिता जी गलती हो गई, माफी बख्शो जी और साथ में आप जी की ईलाही खुशियों को हजम करने की ताकत भी बख्शो जी। धन्य-धन्य शहनशाह पिता जी, जो आप जी अपने बच्चों का कैसे पल-पल छोटी-छोटी बात का भी ख्याल रखते हैं। ऐ सतगुरु प्यारे, हर दम, एक-एक स्वास आप जी के पवित्र चरणों में लगे जी। एक पल के लिए भी अपने दर से दूर ना करना जी।