कीटमुक्त रखें चना, लें उत्पादन घना

चना रबी मौसम में बोई जाने वाली मुख्य दलहनी फसल है। दलहनी फसल होने के कारण देश की अधिकांश शाकाहारी जनसंख्या के भोजन के प्रोटीन का मुख्य स्रोत है। चने का क्षेत्रफल देश में अपेक्षाकृत कम होने के कारण इस फसल के उत्पादन को बढ़ाना भी आवश्यक है।

चने का कम उत्पादन होने के कारणों में इसमें लगने वाले कीट एक प्रमुख कारण हैं। चने में पूरी फसल अवधि के दौरान प्राय: 50 से अधिक कीट प्रजातियों का आक्रमण होता है। दीमक, कट वर्म या कटुआ सुण्डी, चेपा तथा फलीछेदक सुंडी नामक कीट प्रमुख रूप से हानि पहुंचाते हैं। अकेला फलीछेदक कीट ही फसल को 50 प्रतिशत तक नुकसान पहुंचा देता है, इसलिए किसानों को फसल की अवस्था के अनुसार चने में लगने वाले कीटों की पहचान कर उनकी रोकथाम के उपायों को अपनाना चाहिए, ताकि अधिक उत्पादन लिया जा सके।

सही समय पर करें चने में लगने वाले प्रमुख कीटों की रोकथाम

दीमक : इस कीट का आक्रमण हल्की रेतीली व हल्की नमी की अवस्था में अधिक होता है। इस कीट का प्रकोप बिजाई व अंकुरण के समय के अलावा फसल पकने के समय भी होता है। यह कीट पौधे की जड़ों को नुकसान पहुंचाता है, जिससे पौधे सूख जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए खेत से पिछली फसल के अवशेषों को निकाल देना चाहिए तथा फसल में कभी गोबर की खाद का प्रयोग नहीं करना चाहिए। अक्तूबर-नवम्बर में बिजाई से पहले किया गया बीजोपचार भी अंत तक चने की फसल में दीमक की रोकथाम करने में अहम भूमिका निभाता है।

कटवर्म या कटुआ सुण्डी :

चने की फसल को नुकसान पहुंचाने वाला यह एक बहुभक्षी कीट है। कटुआ सुण्डी नामक कीट उगते पौधों के तनों को बीच से तथा बढ़ते पौधों की शाखाओं को काटकर नुकसान पहुंचाती है। कटुआ सुण्डी दिन में जमीन के अन्दर चली जाती है तथा रात को बाहर निकलकर पौधों को हानि पहुंचाती है।

इस कीट की रोकथाम के लिए फेनवलरेट 20 ईसी 80 मिलीलीटर व साहपरमैनित 25 ईसी 50 मिलीलीटर और डेकामेथ्रिन 2.8 ईसी 150 मिलीलीटर को 100 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़कें अथवा 10 कि.ग्राम. फेनवलरेट 0.4 प्रतिशत डस्ट का बुरकाव करें।

फली छेदक सुण्डी :

यह चने की फसल को हानि पहुंचाने वाला मुख्य कीट है। फलीछेदक सुण्डी हरे-पीले रंग की धारियां लिए हुए होती है, जो शुरुआत में पत्तियों व कलियों पर आक्रमण करती हैं। इस सुंडी का आक्रमण चने की फसल में फली बनने के समय होता है। सर्दी की ऋतु में फलीरोधक सुण्डी की क्रियाशीलता कम और वसन्त ऋतु के आगमन पर अधिक होती है। वसंत ऋतु की शुरुआत के समय यह सुण्डी फली में बन रहे चने के बीजों को खाकर नष्ट कर देती है। पहचान के लिए फलीछेदक सुण्डी बीज को खाते समय आधी फली से बाहर और आधी अंदर नजर आती है। यह सुण्डी चने में बहुत हानि पहुचाती है। एक फलीछेदक सुण्डी अपने सम्पूर्ण जीवन चक्र में 30-40 फलियां खा जाती है।

फलीछेदक सुंडी की रोकथाम के लिए इनकी संख्या आखिरी कगार पर होने पर कीटनाशकों का प्रयोग करें तथा एक ही प्रकार के कीटनाशकों का प्रयोग बार-बार नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोधकता विकसित हो सकती है, इसलिए समन्वित कीट प्रबंधन विधि से इस कीट की रोकथाम करनी चाहिए। चने की समय पर बीजी गई फसल व फसल के साथ सरसों व गेहूं बोने से फलीछेदक सुण्डी का आक्रमण कम होता है।

फलीछेदक सुण्डी को चने के खेत से हाथ से पकड़कर भी नष्ट किया जा सकता है। जहां फलीछेदक सुण्डी का प्रकोप हो उस खेत में पक्षियों को बैठने के लिए लकड़ी के टुकड़े गाड़ने चाहिए जिससे पक्षी उन पर बैठकर सुण्डी को खा सकें। जरूरत पड़ने पर फलीछेदक सुण्डी की रोकथाम के लिए क्विनलफास 25 ईसी 400 मिलीलीटर या कार्बेरिक 50 डब्ल्यूपी 400 ग्राम या मोनोक्रोटोफास 30 एसएल 200 मिलीलीटर या फेनवलरेट 20 ईसी 80 मिलीलीटर या साहपरमैथ्रिन 35 ईसी 50 मिलीलीटर या डेकोमेथ्रिन 2.8 ईसी 150 मिलीलीटर को 100 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ खेत में छिड़कें।

इनमें से किसी एक कीटनाशक का उस समय छिड़काव किया जाना चाहिए, जब फसल में 50 प्रतिशत फली आ गई हो।
इस प्रकार किसान चने की फसल में समयानुसार लगने वाले कीटों की पहचान कर उनकी उचित तरीके से रोकथाम करके चने का अधिक उत्पादन लेकर आर्थिक रूप से लाभान्वित हो सकते हैं।

– खुशवीर मोठसरा