आपका सबसे बड़ा दुश्मन हैसंकोच
संकोची आदमी हमेशा जिंदगी के हर मैदान में फिसड्डी रहता है। शर्म का ही एक और रूप है संकोच। अक्सर यह कहा जाता है, ‘जिसने की शरम, उसके फूटे करम’। संकोच मनुष्य का वह अनदेखा-अनजाना शत्रु है जो उसे उस बड़ी उपलब्धि तक से वंचित कर सकता है जिसका वह सही मायने में हकदार है।

आज प्रचार और खुद को जाहिर करने का जमाना है। आप क्या हैं यह जताना होगा। ढिंढोरा पीटने के इस युग में थोथे चने भी घने बजते हैं! आप यदि वाकई प्रतिभावान हैं, आगे बढ़ने की प्रबल इच्छा रखते हैं तो बजिए, यानी कुछ कहिए व करिए क्योंकि आप थोथे नहीं। उतार फेंकिए संकोच का आवरण और उभरने दीजिए अपनी खूबियों का उजाला! यह मत भूलिए, क्योंकि संकोच कभी-कभी व्यक्ति को बड़ी मुश्किल में भी डाल सकता है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो संकोच एक तरह से वह हीन-ग्रंथि है, जो मानव-मन में बचपन से ही जड़ जमा लेती है। इसमें उसका पारिवारिक परिवेश,संस्कार और शिक्षा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यही वजह है कि सभ्य, संस्कारवान परिवार में पले बच्चों के आचार, विचार और व्यवहार में जमीन-आसमान का अंतर होता है।

पहले ही जुबान जहां कोई अपशब्द निकालते अटकेगी, वहीं दूसरे की बातचीत की शुरूआत ही अपशब्द से हो सकती है। यहां संस्कारवान परिवार में पले बच्चे का यह संकोच उसका गहना है, उसकी शोभा है जो स्तुत्य हैं लेकिन संकोच जहां वाजिब हक मांगने की राह में बेड़ी बने, वहां वह अभिशाप है।

दफ्तर में ही नहीं, घर में भी संकोच बहुतों को सताता है, जो घुट-घुट कर जीने को मजबूर करता है। नारी स्वातंत्रय की चाहे जितनी बातें होती हों, पर अपने देश के एक वर्ग की ज्यादातर महिलाएं आज भी शोषण का कड़वा घूंट पीने को मजबूर हैं और इसके लिए मजबूर करता है उनका संकोच कि औरत होकर भला वे मर्दों, बड़े-बूढ़ों के सामने मुंह क्या खोलें! लोग क्या कहेंगे कि कितनी बेशर्म है, बड़ों से मुंह लड़ाती है! यानी हक की वाजिब बात करना भी जहां अपराध माना जाए और वे जन्म से लेकर आखिरी क्षण तक शोषण की आग में ही तो जलती रहती है। उन्हें आह भरने तक का हक नहीं।

जिन्होंने भारत के ग्राम्य जीवन को देखा है वे यह जानते होंगे कि कई प्रांतों में इस बीसवीं सदी में भी औरत मर्द के साथ मिलकर बराबर खड़ती है। घर से लेकर खलिहान तक उसे कोल्हू के बैल की तरह जुता रहना पड़ता है चौबीसों घंटे।

संकोच हीन ग्रंथि जिससे मुक्त हुए बगैर व्यक्ति प्रगति नहीं कर सकता।

शालीनता मानव का धर्म है, लेकिन संकोच एक बेड़ी है, जो उसे एक सीमित परिधि में बांध कर रख देती है। इस बंधन से बाहर आइए और जमाने के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलिए।
– दीपक प्रजापति