देह धार जगत में आए: सम्पादकीय

संत-महापुरुष सृष्टि के उद्धार के लिए ही जगत में देहि धारण करते हैं। जीवात्मा जन्मों-जन्मों (अनन्तकाल) से जन्म मरण के चक्कर में फंसी हुई है, जो कि अपने आप उससे कभी छुटकारा नहीं पा सकती। मन, माया आदि मायावी हाथों में जीवात्मा इस कदर उलझी पड़ी है कि उनसे छुटकारा पाना तो दूर, घर, अपने असल उद्देश्य, अपने मालिक तथा मालिक से किए कौल करार (गर्भ में) भी भूल गई है। तो फिर छूटकारा हो तो हो कैसे?

इसके लिए मालिक ने स्वयं ही विधि बनाई और इसे आजाद करवाने, जन्म-मरण के चक्कर को मुकाने के लिए मालिक स्वयं बंदे का चोला पहन सतगुरु का रूप धारकर आया है। अब भेड़ बकरियों में जन्म से ही पला व बड़ा हुआ शेर का बच्चा कैसे अपने आप को शेर मान सकता है? वह तो यही कहेगा न कि यही मेरे बहन-भाई और मां-बाप हंै जिनके साथ मैं रहता हूं, जिनका मैंने दूध पीया है, खेलता, बैठता, सोता- जागता चरता हूं, जब तक कि खुद शेर नहीं उसे उसकी वास्तविक हस्ती से रूबरू करवा देता।

इसी तरह बेपरवाह सच्चे रहबर शाह मस्ताना जी महाराज ने कलियुगी जीवों के उद्धार के लिए मनुष्य का चोला धारण किया और अपने इसी स्वरूप कुल मालिक परम पिता परमात्मा का सच्चा संदेश चौरासी से मुक्ति प्रदान करने वाला मालिक का सच्चा नाम गुरुमंत्र दुनिया को बताया।

धन -धन सतगुरु तेरा ही आसरा नारा बोलो और चढ़ जाओ नाम की बेड़ी। इक लत जे इत्थे होवे इक (दूजी) होवे सचखंड दे विच तेरी, पूज्य सार्इं जी ने अपने मुर्शिदे कामिल बाबा सावण शाह जी महाराज के वचनानुसार धन-धन सतगुरु का ऐसा नारा दिया जो पूरा नारा धन-धन सतगुरु तेरा ही आसरा बोल देगा तो मौत जैसा भयानक कर्म भी पलक झपकते उसका टल जाएगा।

अनगिनत उदाहरण भी सामने हैं कि वाकई बेपरवाही वचनों में कितनी महान शक्ति है।

इसके अतिरिक्त कि सच्चा सौदा का नाम-लेवा प्रेमी कोई गरीब न रहे यानि अंदर बाहर से वह हमेशा मालामाल रहे। किसी इक्का-दुक्का के कर्म ही कोई इतने भयानक हो, वचनों पर पूरा न हो, क्योंकि ये भी वचन साथ है कि वह वचनों का पूरा हो और थोड़ा बहुत सेवा सुमिरन भी करता हो, तो क्या कहना है, वरना जिससे भी मर्जी कोई पूछ सकता है, मालिक की रहमतों के भंडार भरे हैं हरेक के यहां! जहां कभी टूटा साइकिल भी नहीं हुआ करता था आज मर्सडीज गाड़ियों से पांव नीचे नहीं रखते। ये सतगुरु के नाम की ही बख्शिश, बेपरवाह जी के वचनों का ही चमत्कार है।

तो सर्व सामर्थ सतगुरु हलत पलत यानि दोनों जहानों में मददगार बनता है। और ‘औखी घड़ी’ ‘जित्थे भीड़ बणे उत्थे आ खड़दा’…। तो कभी अपने जीव पर आने ही नहीं देता।

पूरे सतगुरु के वचन युगों-युग अटल हैं। पूज्य बेपरवाह जी ने वचन किए कि सच्चा सौदा का नाम लेवा और सतगुरु का नारा ‘धन-धन सतगुरु तेरा ही आसरा’ जो दाता जी ने बताया है, जो प्रेम व श्रद्धा से बोलेगा, इक लत इत्थे ते दूजी सचखंड विच।

इसमें कोई दो राय नहीं! वचन सौ फीसदी ज्यों के त्यों पूरे होते हैं, होते रहे हैं और पूरे होते रहेंगे, लेकिन जो इक लत इत्थे इस मृत्यु लोक में है, वह भी सही सलामत रहे, उसे कभी आंच तक भी नहीं आए, तो इसकी सुरक्षा के लिए भी सच्चे सतगुरु जी ने नाम शब्द मैथड आॅफ मेडिटेशन (सुमिरन) का आसान राह बताया है।

पूज्य मौजूदा हजूर पिता संत डॉ. एमएसजी लायनहार्ट गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां फरमाते हैं कि यहां मृतलोक में रहते हुए इन्सान को सचखंड जैसे ही नजारे मिलें, मालिक की अपार रहमतों से हमेशा रूबरू रहे, तो इन्सान सेवा सुमिरन करे, वचनों पर पक्का रहे, हक हलाल मेहनत की करके खाये और जितना हो सके जरूरतमंदों की मदद यानि इन्सानियत की सेवा करे। अर्थात इन्सान ज्ञान योगी और कर्म योगी हो तो वह दोनों जहां की खुशियां जीते-जी हासिल कर सकता है।

सच्चे दाता ने सच्चा सौदा के रूप में एक ऐसा पावन स्थान दुनिया पर स्थापित किया जहां जाति धर्म के भेदभाव से ऊपर उठकर सब लोगइकट्ठे मिल बैठकर अपने अल्लाह, राम, वाहिगुरु गॉड की भक्ति कर सकते है।

यह भी दुनिया में अपने आप में एक मिसाल है। सो संत सतगुरु जीवों के उद्धार का उद्देश्य लेकर आते हैं और इतनी खुशियां बख्शते हैं कि कुलों का भी उद्धार होता चला जाता है