करें सैर बूंदी की  :
राजस्थान के हड़ौती क्षेत्र का इतिहास भी गौरवशाली रहा है। यहां के प्रमुख शहर बूंदी का एक अलग ही आकर्षण है। तीन दिशाओं में अरावली की छोटी-छोटी पहाड़ियों से घिरा यह शहर एक घाटी के रूप में बसा दिखता है।

राजस्थान के अन्य क्षेत्रों के समान राज्य के हड़ौती क्षेत्र का इतिहास भी गौरवशाली रहा है। यही कारण है कि यहां के प्रमुख शहर बूंदी में महल, दुर्ग, मंदिर, झीलों जैसे सभी पर्यटन का आकर्षण मौजूद है। फिर भी न जाने क्यूं हड़ौती का बूंदी शहर पर्यटन की दृष्टि से अभी अछूता सा प्रतीत होता है।

बूंदी की भौगोलिक स्थिति इसका एक अलग आकर्षण कही जा सकती है। मोहम्मद गौरी से पराजय के बाद पृथ्वीराज चौहान के कुछ अनुयायी चम्बल घाटी के इस भाग में आ बसे थे। उन्हीं चौहान राजपूतों द्वारा बून्दी शहर को राजधानी बनाने के बाद इसका इतिहास शुरू हुआ। उसी समृद्ध इतिहास के अनेकों प्रतीक यहां आज भी मौजूद हैं। ये शूरवीरों की वीरता और बलिदान के मूक गवाह रहे हैं। इन्हें देखने यहां अनेक देशी व विदेशी सैलानी आते हैं।

बूंदी एक दुर्गनगर है, जिसमें ‘गिरि दुर्ग’और ‘स्थल दुर्ग’ की विशेषताएं जुड़ी हैं। इसके चार द्वार पाटनपोल, भैरवपोल, शुकुलवारी पोल एवं चौगान हैं। एक तरह से यह दुर्ग दो भागों में बंटा है। ऊपरी भाग को तारागढ़ और नीचे के भाग को ‘गढ़’ कहते हैं। शहर का मुख्य आकर्षण तारागढ़ फोर्ट है। लगभग पांच सौ फुट ऊंची एक पहाड़ी पर स्थित यह फोर्ट (किला) सैलानियों को दूर से ही आकर्षित करने लगता है।

इसकी स्थापना सन्1352 में राव बरसिंह ने शत्रुओं के हमलों से बचाव के लिए की थी। आज यह दुर्ग राजपूत वास्तुशैली का एक भव्य उदाहरण माना जाता है। तारागढ़ परिसर में चार पक्के विशाल जलाशय हैं। किले के झरोखों से शहर का विहंगम दृश्य देखते ही बनता है। इसमें नवलसागर झील का सुंदर रूप अलग ही नजर आता है। दुर्ग के परकोटे में कोई बुर्ज नहीं है, बल्कि मध्य में भीमबुर्ज स्थित है। परिसर में 84 स्तम्भों की छतरी किले का गौरव है। इस छतरी के मध्य पावन शिवलिंग अवस्थित है।

दूसरे भाग गढ़ में प्रवेश के लिए हजारीपोल, हथियापोल और गणेशपोल प्रमुख हैं। यहां आकर सैलानियों को महलों की भव्यता देखने को मिलती है। इनमें छत्र महल, अनिरुद्ध महल, रतन महल, फूल महल, बादल महल एवं उम्मेद महल महत्वपूर्ण हैं। महलों में दीवान ए आम, चित्रशाला, दरीखाना और रतन गुम्मट की शोभा अलग ही नजर आती है। छत्रमहल यहां का सबसे पुराना महल है।

सभी महलों की कलात्मक छवि और भितिचित्र इनकी विशेषता कहे जाते हैं। मेहराबों, छज्जों, तिबारों, बारादरियों और चौकियों की निर्माण शैली वास्तव में दर्शर्नीय है। यहां चित्रशाला जैसा एक कलाधाम है। दरअसल छत्रमहल और चित्रशाला में भित्तिचित्रों का दुर्लभ खजाना छिपा है। इनमें रागमाला और रासलीला के अलावा शिकार आदि के भी चित्र हैं।

किले की प्राचीर का निर्माण जयपुर के फौजदार दलेल सिंह ने करवाया था। दुर्ग में चार बड़े कुंड हैं। रहने के लिए सुंदर महल और रनीवास है। किले का आकर्षण यहां एक काफी ऊंचा बुर्ज है जिसे ‘भीम बुर्ज’ के नाम से पुकारा जाता है। बुर्ज के नजदीक ही एक छतरी है। इसे भीम राव अनिरुद्ध सिंह के धर्मभाई देवा ने बनवाया था। इसके अंदर एक मंदिर, किलेधारी का मंदिर है जिसे राजा उम्मेद सिंह ने बनवाया था। लेकिन आज इस किले का सब कुछ खंडहर में तब्दील हो चुका है।

इस खंडहर में भी एक जगह ऐसी है जहां दो मिनट के लिए आप अपने आपमें ठिठक जाएंगे। यह जगह है, ‘किले की चित्रशाला’। उम्मेद महल के नाम से प्रसिद्ध इस भव्य चित्रशाला का निर्माण भी राव उम्मेद सिंह ने करवाया था। यहां राव उम्मेद सिंह तथा राव बिसन सिंह की तस्वीरें हैं। इस चित्रमहल की विषयवस्तु राग-रागनियों, राजकीय समारोह, गोवर्धन धारी चीर हरण, राम विवाह, ढोलामारु तथा महामिरातेब हैं। चित्रशाला पर मुगल और मेवाड़ शैली का असर है।

शहर से किले और महलों तक जाने के लिए बाजार, चौगान, दरवाजे और बहुत सी पुरानी इमारतों के मध्य से गुजर कर जाना होता है। पर्यटकों को उस समय ऐसा प्रतीत होता है जैसे विपरीत दिशा से बूंदी के इतिहास के पन्ने पलट कर देख रहे हैं।

बूंदी में प्राचीन समय में जलसंरक्षण एवं संवर्धन की खास परम्परा रही है। इसका प्रमाण हैं यहां की ‘झीलें’। यह प्राकृतिक झीलें नहीं हैं, बल्कि इनका निर्माण (समय-समय पर) यहां के राजाओं ने करवाया था। यह झीलें आज बूंदी की खूबसूरती का खास हिस्सा हैं। दुर्ग पहाड़ी के साये में स्थित नवलसागर उनमें से एक है। चतुर्भुज आकार की इस झील के मध्य वरुण देवता का मंदिर है।

कुछ दूर सुखसागर झील एक हरे-भरे उद्यान के मध्य पसरी है। जहां राजाओं की ग्रीष्म विश्रामगाह ‘सुख महल’ भी बना है। इसी तरह फूलसागर में भी 20वीं शताब्दी में निर्मित यहां का नवीनतम महल स्थित है। शहर से करीब तीन किलोमीटर दूर जैतसागर पहाड़ियों के साये में स्थित झील है। इस झील में लगे फव्वारे के चलने पर झील का झिलमिलाता पानी अधिक सुंदर लगता है।

कब जाएं :-

प्राय: मई-जून की गर्मी को छोड़कर सैलानी सारा साल बूंदी जाते हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि बूंदी आने का उपयुक्त समय मानसून के साथ शुरू होता है। दरअसल उस समय यहां की झीलें अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करती हैं।
वैसे बूंदी जाने का सबसे बेहतर समय जुलाई-अगस्त में आने वाली ‘कजली तीज’ के मौके को माना जाता है।

यह इस क्षेत्र का विशेष पर्व है। भादों माह की तीज को आने वाले इस पर्व पर यहां के लोगों, विशेषकर महिलाओं का उल्लास देखते ही बनता है। तीन दिन तक चलने वाला यह पर्व एक पर्यटन उत्सव का रूप ले चुका है।

कैसे जाएं :-

बूंदी जाने के लिए कोटा को माध्यम बनाया जा सकता है। कोटा शहर दिल्ली-मुम्बई लाइन पर स्थित है, इसलिए यह सुपर फास्ट और एक्सप्रेस ट्रेनों द्वारा बखूबी जुड़ा है। कोटा से बूंदी की दूरी मात्र 38 किलोमीटर है।
हवाई मार्ग से जाना हो तो पहले जयपुर जाना होगा। जयपुर बूंदी से 206 किलोमीटर दूर है।

सड़क मार्ग से जाने के लिए सैलानी जयपुर से राजमार्ग-12 से बूंदी पहुंच सकते हैं।
वैसे कोटा के अलावा जयपुर, अजमेर, उदयपुर और चित्तौड़गढ़ से बूंदी के लिए पर्याप्त बस सेवा उपलब्ध है, यहां से पर्यटक आसानी से बूंदी पहुंच सकते हैं। – मनोज कुमार