रूहानी संतों का सत्संग संजीवनी बख्शता है :

सम्पादकीय

जी हां, धर्मों में और ईश्वर के सच्चे संतों-भक्तों का मानना है कि संतों के सच्चे सत्संग में रूहानियत की रौएं यानि पॉजिटिव रेज़ फील होती हैं और जो भी सत्संग के दायरे में आता है, वह वहां के रूहानी अमृतमयी वचनों की वर्षा (ईश्वर भक्ति में रंग जाता है)। उसके गम दु:ख आदि सब परेशानियां दूर होती हैं। और उसे एक अलौकिक खुशी मिलती है।

डेरा सच्चा सौदा में पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने पिछले दिनों एक रूहानी मजलिस में फरमाया कि सत्संग के काफी बड़े दायरे में उस परम पिता परमात्मा के नाम की ऐसी किरणें होती हैं और जो लोग श्रद्धा-भावना के साथ चलकर आते हैं उन्हें सत्संग के गेट के अंदर दाखिल होते ही खुशियां आनी शुरू हो जाती हैं, बल्कि असल में जब वो अपने घर से चलते हैं, नहीं-नहीं बल्कि जैसे ही वो सत्संग में आने के लिए सोचते हैं, तभी से ही उन्हें खुशियां आनी शुरू हो जाती हैं, लेकिन बात है श्रद्धा, सच्ची भावना और दृढ़ विश्वास की।

दृढ़ यकीन जो रखते हैं, उनके भयानक से भयानक रोग संतों, पीर-फकीर की एक बात एक वचन से ही कट जाया करते हैं अर्थात उनकी बीमारियां भी तंदुरूस्ती में बदल जाती है। यह सौ प्रतिशत सच है क्योंकि धर्म-ग्रन्थों में भी ऐसे बहुत से उदाहरण पढ़ने सुनने को मिलते हंै।

एक वाकया वर्णन में आया कि एक बार एक ऐसा व्यक्ति डेरा सच्चा सौदा में पूज्य गुरु जी से मिला जो बहुत ही बीमार था। आखिरी स्टेज थी उसकी बीमारी की। उसे पीजीआई चंडीगढ़ से कई दिनों के ईलाज के बाद जवाब मिल गया था कि यह कुछ दिनों का ही मेहमान है, घर पर सेवा करो और परिवार जन मरीज को यहां ले आए थे। रूहानी संत, मालिक के हुक्म में ही बोलते हैं जैसा मालिक की रज होती है। पूज्य गुरु जी ने स्वाभाविक ही उन्हें पीजीआई चंडीगढ़ दिखाने का वचन किया और परिवार वालों को सुमिरन व सेवा का वचन फरमाया।

वो लोग यहीं से ही पीजीआई चले गए। हालांकि डाक्टर एक दम नाराज भी हुए कि जब कह दिया कि इसमें कुछ नहीं, आप गए क्यों नहीं? उन्होंने डाक्टर साहिब से नम्रता से कहा, सर, आप एक बार देख लीजिए और दवा आदि लिख दें जो देनी है, हम घर ले जाएंगे। तो डाक्टर साहिब न चाहते हुए चैक करके पर्ची पर दवा आदि लिख दी।

बस जो वचन था पूरे हुए, दिखा लिया। कहते अब चलो। कोई दवाई की जरूरत नहीं क्योंकि गुरु जी ने दवाई के लिए तो बोला ही नहीं था। वो यहां आए और वचनानुसार सेवा सुमिरन करने लगे। बस, फिर क्या देर थी, दो चार दिन में मरीज की सेहत में सुधार होने लगा। आज और, कल और तथा कुछ कु दिनों में वह (मरीज) लंगर-भोजन, चाय-दूध सब कुछ खाने व पचने भी लगा और वह देखते ही देखते तंदुरुस्त हो गया।

पूज्य गुरु जी का तहेदिल से धन्यवाद किया जिनके रहमो करम से नया जन्म मिला था। बात खुली तो पता चला कि जहां पूज्य गुरु जी ने दिखाने का वचन किया था, उसी पीजीआई से वे दो-अढ़ाई महीने दाखिल रहे और वहीं से जवाब मिला था। बात आई दृढ़ यकीन, सतगुरु पर दृढ़ भरोसे की कि गुरु जी ने सिर्फ दिखाने को बोला है, दवाई के लिए तो कहा ही नहीं। इसीलिए उन्होंने कोई दवाई बगैरह कहीं से नहीं ली।

तो वो ही बात, कि जो मुरीद पूरी दृढ़ता से अपने मुर्शिद, गुरु पीर-फकीर के वचन मानता है, उसकी बीमारियां भी तंदुरूस्ती में बदल जाया करती हैं। हाथ कंगन को आरसी क्या, पढे लिखे को फारसी क्या! सच्चे गुरु, पीर-फकीर उसकी तली पर सरसों जमा देते हैं जो लोग अपने पीर-फकीर पर पक्का यकीन रखते हैं।

दुनिया इधर से उधर हो जाए, गरीबी कंगाली भूख नंग आदि कितनी भी मुश्किलें आ जाएं, सच्चा मुरीद अपने गुरु का दर नहीं छोड़ता। इतिहास भरे पड़े हैं, भाई मंझ जैसे भी सच्चे आशिक हुए हैं कि ना-ना भाई, मेरे गुरु को मत कोई दोष दीजिए। दोष मेरा है, कमी मुझमें हो सकती हैं।

अपनी आशिकी के लिए जिन्होंने अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। और अपने ऐसे मुरीदों को सतगुरु मालिक किसी चीज की भी कमी नहीं छोड़ते। उसे अपनी दया-मेहर, अपने रहमो करम तथा अपने अद्वितीय प्रेम के खजानों से मालोमाल कर देते हैं। तो यह धर्मां में आया है कि क्यों किंतु परंतु आदि छोड़कर धर्मों व संत महापुरुषों के बताए सद्मार्ग पर दृढ़ता पूर्वक चलेंगे तो, ‘भगवद दर्शन’, प्रभु-परमात्मा भी अपने नूरी स्वरूप से उसे मालामाल कर देगा कोई कमी कभी आने ही नहीं देगा ।