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28 फरवरी पर विशेष : 57वां गुरगद्दीनशीनी दिवस(महा रहमोकरम दिवस) जाहिर हो गए सोहणे दातार..

पूज्य बेपरवाह शाह मस्ताना जी ने परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज को गुरुगद्दी बख्शिश का 28 फरवरी 1960 का दिन निश्चित किया। पूज्य बेपरवाह जी के हुक्मानुसार इस शुभ दिन पर पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली आदि दूर-दूर इलाकों से साध-संगत सच्चा सौदा सरसा में पंहुच गई थी।

पूज्य बेपरवाह सार्इं जी के हुक्मानुसार इस दिन आप जी को सिर से पैरों तक 100-100 के नोटों के हार पहनाए गए। उपरांत बिना छत वाली एक जीप बहुत ही सुंदर तरीके से सजाई गई। जीप के अंदर एक खूबसूरत सजाई गई कुर्सी पर आप जी को विराजमान कर पूज्य बेपरवाह मस्ताना जी महाराज ने संगत में वचन फरमाया, ‘‘सरदार सतनाम सिंह जी बहुत ही बहादुर हैं। इन्होंने इस ‘मस्ताना’ गरीब के हर हुक्म को माना है और बहुत बड़ी कुर्बानी दी है।

इनकी जितनी तारीफ की जाए, उतनी ही कम है। आज से हमने इन्हें अपना वारिस, खुद-खुदा, कुल मालिक बना दिया है।’’ इसके साथ ही पूज्य बेपरवाह मस्ताना जी महाराज ने साध-संगत को हुक्म दिया ‘‘सरसा शहर की हर गली और हर मुहल्ले में शोभा-यात्रा निकालनी है, ताकि शहर के बच्चे-बच्चे को पता चल जाए कि सरदार सतनाम सिंह जी श्री जलालआणा साहिब वाले सरदार साहिब ने गरीब मस्ताने के लिए इतनी जबरदस्त कुर्बानी दी है।

सतगुरु के हुक्म से इन्हें (पूज्य परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज को) आज से ही सच्चा सौदा का वारिस बना दिया है।’’ पूजनीय सार्इं जी ने आश्रम में मौजूद समस्त साध-संगत को यह भी हुक्म फरमाया कि ‘समस्त साध-संगत ने शोभा-यात्रा के साथ नगर-भ्रमण पर जाना है और जोर-शोर से नारा ‘धन धन सतगुरु तेरा ही आसरा’ बोलना है तथा शहरवासियों को यह भी बताना है कि सार्इं सावण शाह जी के हुक्म से हमने श्री जलालआणा साहिब वाले सरदार सतनाम सिंह जी को आज से डेरा सच्चा सौदा का उत्तराधिकारी बना दिया है।

सभी ने शोभा-यात्रा में शामिल होना है।’ हालांकि पूज्य बेपरवाह मस्ताना जी महाराज का यह आदेश सभी के प्रति था, लेकिन फिर भी कुछ प्रेमी आश्रम में रुक गए थे। उन्हें दरबार में घूमते हुओं को देखकर पूज्य बेपरवाह जी ने उनसे शोभा-यात्रा में न जाने का कारण पूछा। वे प्रेमी कहने लगे कि ‘सार्इं जी, हम आप जी के दर्शनों के लिए रुक गए थे।

’ इस पर पूजनीय बेपरवाह मस्ताना जी ने कड़कती आवाज में फरमाया, ‘‘बई, हमने तो अपना सब कुछ श्री जलालआणा साहिब वाले सरदार सतनाम सिंह जी को दे दिया है। मौज के दर्शन करने हैं, तो जुलूस (शोभा-यात्रा) में जाकर सरदार सतनाम सिंह जी के दर्शन करो। अब हमारे पास कुछ भी बाकी नहीं बचा है।’’

इस प्रकार 28 फरवरी 1960 का वह पावन दिन डेरा सच्चा के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया। पूज्य बेपरवाही हुक्मानुसार उस दिन सारे सरसा शहर का आकाश ‘धन धन सतगुरु तेरा ही आसरा’ के नारों से गूंज उठा था तथा शोभा-यात्रा में बैंड-बाजों की सुरीली धुनों से शहर का समस्त वातावरण संगीतमय हो गया था।

शोभा-यात्रा में साध-संगत ऊंचे-ऊंचे गगन गुंजाऊ नारों के साथ-साथ पूज्य बेपरवाह जी द्वारा फरमाए इन वचनों को भी दोहरा रही थी कि ‘आज से सरदार सतनाम सिंह जी को पूज्य बेपरवाह मस्ताना जी महाराज के हुक्म से डेरा सच्चा सौदा का वारिस, कुल मालिक बना दिया है।’

शहनशाही शोभा-यात्रा जब पूरे सरसा शहर का भ्रमण करने के बाद वापिस आश्रम में पहुंची तो पूज्य बेपरवाह मस्ताना जी महाराज अपने उत्तराधिकारी और डेरा सच्चा सौदा के वारिस के स्वागत में स्वयं पहले से ही आश्रम के मुख्य द्वार पर विराजमान (खड़े) थे। समस्त साध-संगत में पूज्य बेपरवाह सार्इं जी ने आप जी की तरफ इशारा करते हुए वचन फरमाए, ‘‘भई सरदार सतनाम सिंह जी को आज ‘आत्मा से परमात्मा’ कर दिया है।

’’ उसके बाद पूज्य सार्इं जी ने जुलूस में साथ गई समस्त साध-संगत को पंक्तियों में बैठने का आदेश फरमाया। सभी के बैठ जाने पर पूज्य बेपरवाह जी ने एक-एक को अपने पवित्र कर-कमलों से स्वयं प्रसाद दिया।

सख्त परीक्षा:-

पूज्य बेपरवाह सार्इं मस्ताना जी महाराज ने पूज्य परमपिता जी को पहले दिन से ही अपने नूरी नजर में ले लिया था और उसी दिन से ही आप जी को अपना भावी वारिस, डेरा सच्चा सौदा के दूसरे पातशाह के रूप में मान लिया था और साथ ही आप जी के लिए पल-पल, कदम-कदम पर इम्तिहान भी शुरू कर दिए थे। जनवरी 1958 की बात है। आप जी सरसा में पूज्य बेपरवाह मस्ताना जी महाराज को आकर मिले। पूज्य सार्इं मस्ताना जी महाराज आप जी को देखकर बहुत खुश हुए। सार्इं जी ने आप जी से श्री जलालआणा साहिब की साध-संगत का हाल-चाल पूछा।

आप जी ने अपने रहबर पूज्य बेपरवाह जी के पवित्र चरणों में अपने गांव के आश्रम के बारे विनती की, ‘हमारे गांव का डेरा ‘मस्तपुरा धाम’ बिल्कुल तैयार हो गया है। आप जी अपने मुबारक चरण टिकाएं जी।’ इस पर पूज्य बेपरवाह जी ने फरमाया कि ‘हम शाम तक आपके गांव में चलेंगे।’ आप जी ने अपने साथ आए प्रेमी हाकम सिंह जी को साध-संगत को पूज्य सार्इं जी के शुभ आगमन की सूचना देने के लिए उसी समय श्री जलालआणा साहिब में भेज दिया।

शाम को पूज्य सार्इं मस्ताना जी महाराज आप जी को अपने साथ जीप में बैठाकर ‘डेरा सच्चा सौदा मस्तपुरा धाम’ श्री जलालआणा साहिब में पधारे। पूज्य बेपरवाह जी ने सारी संगत का हालचाल पूछा और वचन फरमाया कि ‘‘मुल्ख माही दा वस्से, कोई रोवे ते कोई हस्से।’’ आनन्दपुरा रोवे ते मस्तपुरा हस्से।’ अर्थात् आज मस्तपुरा धाम में साध-संगत पूज्य शहनशाह जी के दर्शन करके खुश है और गदराना में डेरा आनन्दपुरा धाम गिराया जा रहा है, इसलिए वहां गांव की संगत निराशता के आलम में डूबी हुई है।

पूज्य बेपरवाह जी ने श्री जलालआणा साहिब में साध-संगत पर अपनी रहमतों के भण्डार बख्शते हुए सभी को अपने पवित्र कर-कमलों से प्रसाद दिया। उपरांत आप जी की ओर मुखातिब होते हुए वचन फरमाए, ‘‘सरदार हरबंस सिंह! अभी गदराना में जाकर वहां के गिराए डेरे का सारा सामान यहां पर ले आओ।’’ आप जी अपने प्यारे मुर्शिद की आज्ञा पाकर उसी समय अपना ट्रैक्टर-ट्राली तथा कुछ ऊंट-गाड़ियां लेकर गदराना को प्रस्थान कर गए। उस समय रात को पूज्य बेपरवाह जी के पास 7-8 सेवादार मौजूद थे।

उसी रात करीब बारह बजे पूज्य बेपरवाह जी ने सेवादारों को चोरमार वाला डेरा गिरा कर वहां का भी सारा सामान मस्तपुरा धाम में उठा लाने का आदेश फरमाया। इस प्रकार पूज्य सार्इं जी के हुक्मानुसार सेवादार उसी समय चोरमार चले गए और रातो-रात जाकर वहां का डेरा गिरा दिया और र्इंटों को छोड़कर वहां का सारा सामान मस्तपुरा धाम में उठा लाए। बाद में पूज्य बेपरवाह जी के हुक्म से सेवादारों ने उन र्इंटों का वहां चोरमार में एक चबूतरा बना कर उस पर झंडा गाड़ दिया।

गदराना वाले डेरे का सामान अभी भी लाया जा रहा था। जब तक गदराना का सारा सामान उठा नहीं लाया गया, पूज्य परमपिता जी वहीं पर ही रहे। आप जी वहां का सामान स्वयं ऊंट-गाड़ियों में लदवा रहे थे। लेकिन इधर पूज्य सार्इं जी ने गिराए गए दोनों डेरों का सामान मौज मस्तपुरा धाम से घूकांवाली डेरे के सेवादारों को बुलवाकर वहां भिजवा दिया। उपरांत पूज्य बेपरवाह जी ने आप जी को मस्तपुरा धाम में सेवा करने वाले सेवादारों की लिस्ट बनाकर देने का आदेश दिया।

उन सभी सेवादारों को दातें (प्रेम निशानियां) प्रदान की जानी थी। यह शहनशाही हुक्म पाकर आप जी ने सारी साध-संगत को एक जगह इकट्ठा करके उनसे विचार-विमर्श किया कि हमें सतगुरु जी से क्या मांगना चाहिए। सारी साध-संगत आप जी के अनुसार ही एक-मत थे। इस पर आप जी सभी को साथ लेकर पूज्य पावन हजूरी में पहुंचे। आप जी ने अपनी झोली फैलाकर पूज्य बेपरवाह जी से सादर विनती की, ‘‘सार्इं जी! हमें तो आपका प्रेम चाहिए।

’’ इस पर पूज्य सार्इं मस्ताना जी महाराज बहुत खुश हुए और वचन किए, ‘‘बल्ले-बल्ले! श्री जलालआणा साहिब का प्रेम देखो भाई, ऐसी चीज आज तक किसी ने नहीं मांगी।’’ फिर फरमाया कि ‘‘इस आश्रम में जिस किसी ने सेवा की है, वह सब दरगाह में मंजूर है।’’

वर्णनीय है कि पूज्य परमपिता जी अपने सच्चे रहबर बेपरवाह सार्इं मस्ताना जी महाराज के हर हुक्म को सच्चे दिल से मानते व उस पर हंसते-हंसते फूल चढ़ाते थे। अपने शुभ गुणों के द्वारा पूज्य परमपिता जी ने अपने सतगुरु, पूज्य शहनशाह जी को खुश कर लिया था। पूज्य शहनशाह जी ने आप जी पर खुश होकर श्री जलालआणा साहिब के डेरे का नाम
‘मस्तपुरा धाम’ से बदल कर ‘मौज मस्तपुरा धाम’ रख दिया, अर्थात् ‘मौज यहां पर मस्त हो गई।

’अठारह दिन तक श्री जलालआणा साहिब में रहने के बाद जब पूज्य बेपरवाह जी सरसा आश्रम के लिए वहां से रवाना होने लगे, तो आप जी को बुलाकर फरमाया, ‘‘सरदार हरबंस सिंह! (पूज्य परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज) हमने तुम्हारी परीक्षा ली, किंतु तुम्हें पता तक नहीं चलने दिया।’’

इसके बाद पूज्य बेपरवाह जी ने पूज्य परमपिता जी को अपना मकान तोड़कर (गिराकर) घर का सारा सामान डेरा सच्चा सौदा सरसा में लाने का आदेश फरमाया। अपने मुर्शिदे-कामिल का यह पावन आदेश पाकर आप जी ने सत् वचन कहा और अपने हवेलीनुमा मकान को स्वयं अपने हाथों से तोड़ गिराया तथा घर का सारा सामान व गिराए गए मकान का सारा मलबा, एक-एक र्इंट, छोटी कंकर तक भी ट्रकों व ट्रैक्टर-ट्रालियों में लादकर डेरे के आंगन में लाकर रख दिया। रात को पूज्य बेपरवाह मस्ताना जी महाराज गुफा से बाहर आए और आंगन में रखे सामान के इतने बड़े ढेर को देखकर फरमाया, ‘‘यह सामान किसका है और यह यहां पर क्यों रखा है? गौरमेंट तो हमें पहले ही नहीं छोड़ती।

अगर कोई हमसे पूछे कि तुम किसका घर पट के लाए हो, तो हम क्या जवाब देंगे?’’ वहां पर मौजूद सेवादारों ने पावन हजूरी में बताया कि सार्इं जी, यह सारा सामान श्री जलालआणा साहिब वाले सरदार साहिब सरदार हरबंस सिंह जी (पूज्य परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज) का है जी। इस पर बेपरवाह सार्इं जी ने सख्ती से आदेश फरमाया, ‘‘जिसका ये सामान है वो डेरे से बाहर रखे या शहर में रखे और अपने सामान की खुद रखवाली करे।’’

पूज्य शहनशाह जी का आदेश पाते ही सेवादारों ने तुरंत सारा सामान डेरे से बाहर पहले वाले कच्चे रास्ते के किनारे पर ढेर लगा दिया। पूज्य परमपिता जी ने अपने मुर्शिदे-कामिल के वचनानुसार स्वयं सामान के पास बैठकर रखवाली की। सर्दी का मौसम, कड़ाके की ठण्ड और ऊपर से लगातार बूंदा-बांदी भी हो रही थी तथा तेज ठण्डी हवा भी चल रही थी।

आप जी ने ऐसी किसी भी बात की परवाह नहीं की, क्योंकि आप जी के लिए अपने मुर्शिद के वचन सर्वोपरि थे।
अगले दिन एक और सख्त परीक्षा! पूज्य बेपरवाह जी ने आप जी को अपने पास बुलाया तथा आप जी के सभी साक-संबंधियों व शाही परिवार को भी बुलाया। पूज्य बेपरवाह जी ने शाही परिवार के एक-एक मैंबर से सामान के बारे पूछा कि ये ‘ये सामान किसका है?’ सभी परिवार-जन एक-मत ही थे।

सभी ने विनम्रता पूर्वक अर्ज की, ‘सार्इं जी! सब आप जी का ही है।’ उस दिन रविवार का दिन था। वो सत्संग का दिन था। पूज्य शहनशाह मस्ताना जी महाराज ने आप जी के हाथों मोटर साइकिल सहित एक-एक करके सारा सामान संगत में लुटा दिया।

सतनाम, कुल मालिक बनाया:-

इस तरह सारा सामान संगत में लुटा देने के बाद पूज्य बेपरवाह जी ने आश्रम के सेवादार पाठी जी से पोथी (ग्रंथ) से पढ़वाकर सुनाया, उसमें

लिखा है कि श्री कृष्ण जी गोपियों को संबोधित करते हुए फरमाते हैं कि ‘तुमने लोहे के सामान अटूट बंधनों को तोड़कर मुझसे अति ऊंचे दर्जे की प्रीत लगाई है और इसके बदले में मैंने तुम्हें जो राम-नाम का रस प्रदान किया है, वह बहुत कम है, इसलिए मैं क्षमा का पार्थी हूं, मुझे क्षमा कर देना।

’ इस पर पूज्य बेपरवाह जी ने वचन फरमाया, ‘‘उन गोपियों की तरह सरदार हरबंस सिंह जी ने भी अपने सतगुरु के नाम पर इतनी बड़ी जो कुर्बानी दी है और इसके बदले में हमने जो इन्हें राम-नाम का रस दिया है, वह बहुत ही कम है। इसलिए हम भी माफी के अधिकारी हैं।’’

उपरांत पूज्य बेपरवाह सार्इं जी ने आप जी को वचन फरमाए, ‘‘सरदार हरबंस सिंह! आपको आपकी कुर्बानी के बदले ‘सच’ देते हैं, ‘सतनाम’ करते हैं।’’ पूज्य बेपरवाह सार्इं जी ने साध-संगत में फरमाया, ‘‘हमने सरदार सतनाम सिंह को सतगुरु, कुल-मालिक बना दिया है। मालिक ने इनसे बहुत काम लेना है।

’’उपरांत पूज्य सार्इं मस्ताना जी महाराज ने डेरा सच्चा सौदा सरसा दरबार में एक बहुत ही सुंदर तीन मंजिली गोल गुफा अपने दिशा-निर्देश में तैयार करवाई। जिसमें आप जी की हवेली का ही सारा सामान, र्इंटें, गार्डर, लकड़ी, बाला आदि सब प्रयोग किया गया है।

अनामी गुफा भेंट करना ‘न हिल सके, न कोई हिला सके’:-

दिनांक 28 फरवरी 1960 को रूहानी जुलूस की वापिसी के बाद पूज्य बेपरवाह मस्ताना जी महाराज ने पूज्य परमपिता जी की हवेली के ही समान र्इंटों, गार्डरों आदि से विशेष तौर पर तैयार की गई गुफा के बारे पवित्र मुख से फरमाया, ‘‘सतगुरु के हुक्म से ही यह गोल गुफा बनाई गई है। यह गुफा (तेरा वास) सरदार सतनाम सिंह जी को ईनाम में दी है।’’
पूज्य बेपरवाह जी ने एक बार फिर से स्पष्ट करते हुए वचन फरमाया कि ‘सरदार सतनाम सिंह जी का नाम पहले सरदार हरबंस सिंह जी था। ये ईश्वरीय शक्ति गांव श्री जलालआणा साहिब जिला सरसा के रहने वाले हैं। राम-नाम को हासिल करने के लिए इन्होंने अपना मकान (घर) तोड़ा और दुनिया की बदनामी सही।

इसलिए यह गुफा इन्हें ईनाम में मिली है। हर कोई यहां पर रहने, जगह लेने का अधिकारी नहीं है। जिसे ऊपर से (सतगुरु का) हुक्म होता है, यहां पर उसी को ही जगह मिलती है।’उसके बाद पूज्य बेपरवाह मस्ताना जी महाराज ने पूज्य परमपिता जी को स्वयं गुफा में बिठाया और साथ ही ये वचन भी फरमाए, ‘‘जिस तरह मिस्त्रियों ने गुफा (बिल्डिंग) की मजबूती के लिए इसमें तीन बंद लगाए हैं, हमने भी सरदार सतनाम सिंह जी को (हाथ का इशारा करते हुए) तीन बंद लगा दिए हैं। बारिश आए, झख्खड़ आए, आंधी आए, भूचाल आए, ना ये हिल सकेंगे और न ही इन्हें कोई हिला सकेगा।’’ इस तरह पूज्य बेपरवाह मस्ताना जी महाराज ने उसी दिन से ही आप जी को स्टेज पर अपने साथ बिठाना शुरू कर दिया था। ‘संत वचन पलटे नहीं पलट जाए ब्रह्मण्ड।’

गुरुगद्दी रस्म:-

दिनांक: 28 फरवरी 1960 पूजनीय बेपरवाह मस्ताना जी महाराज के हुक्मानुसार आश्रम में शाही स्टेज को विशेष तौर पर सजाया गया था। उपरांत पूज्य बेपरवाह जी ने सेवादारों को मुखातिब होते हुए हुक्म फरमाया कि ‘‘सरदार सतनाम सिंह जी को गुफा में से लेकर आओ।’’ पूज्य बेपरवाह जी का यह पावन आदेश पाकर उनमें से दो सेवादार आप जी को बुलाकर लाने के लिए गुफा की ओर चल पड़े। पूज्य सार्इं जी ने उन्हें रोकते हुए पवित्र मुख से फरमाया, ‘‘ऐसे नहीं भाई, दस सेवादार प्रेमी इकट्ठे होकर जाओ और सरदार सतनाम सिंह जी को पूरे सम्मान व सत्कार सहित स्टेज पर लेकर आओ।’’सत्संग पंडाल साध-संगत से भरा हुआ था। समस्त

साध-संगत अत्यंत उत्सुकता से स्टेज की तरफ निहार रही थी। पूज्य बेपरवाह जी ने अपना भरपूर स्नेह प्रदान करते हुए आप जी को अपने बराबर स्टेज पर बिठाया। उपरांत पूज्य बेपरवाह जी ने आप जी को नोटों के हार पहनाए और साध-संगत को सम्बोधित करते हुए पवित्र मुख से वचन फरमाया, ‘‘दुनिया सतनाम-सतनाम जपती मर गई, किसी ने देखा है भई! बोलो! बोलो!!’’ सारी संगत में एकदम सन्नाटा छा गया। कोई कुछ नहीं बोल सका। पूज्य बेपरवाह जी ने जोश में आकर आगे फिर फरमाया, ‘‘भई, जिस सतनाम को दुनिया
जपती-जपती मर गई, पर वो सतनाम नहीं मिला।

वो ‘सतनाम’ (आप जी की तरफ इशारा करते हुए पूज्य बेपरवाह जी ने साध-संगत में बताया) ‘ये’ हैं। ये वो ही सतनाम हैं, जिसके सहारे ये सारे खण्ड-ब्रह्मण्उ खड़े हैं। हम इन्हें दाता सावण शाह सार्इं जी के हुक्म से मालिक से मंजूर करवा कर लाए हैं और तुम्हारे सामने बिठा दिया है।’’ पूज्य बेपरवाह सार्इं जी ने आगे फिर फरमाया, ‘‘भई, इनके (पूज्य परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज के) भाईचारे का कोई आदमी या इनका कोई रिश्तेदार, संबंधी आकर पूछे, ‘‘गरीब मस्ताने ने तेरा घर-बार तुड़वाया व गिरवा दिया है, तेरे को क्या मिला है?तो भाई, ये उन्हें

अपनी यह ‘गोल गुफा’ दिखा सकते हैं। यह गोल गुफा तो पक्की र्इंटों से बनी है, परंतु जो असली गोल गुफा (अपनी दोनों आंखों के बीच इशारा करते हुए) इनको (पूज्य परमपिता जी को) दी है, उसके एक बाल के बराबर ये तीन लोक भी नहीं हैं।’’ इस तरह पूज्य बेपरवाह जी ने पवित्र गुरुगद्दी-रस्म को पूर्ण गुरु-मर्यादा के अनुसार सम्पन्न करवाया। पूज्य बेपरवाह जी ने डेरा सच्चा सौदा के सभी अधिकार एवं अपनी समस्त जिम्मेदारियां भी उसी दिन से ही आप जी को सौंप दी और अपना ‘खुद का’ ‘इलाही स्वरूप’ भी आप जी को बख्श कर ‘खुद-खुदा, अल्लाह, राम, भगवान’ बना दिया।
यह पूरी दुनिया के सामने एक अद्वितीय उदाहरण है। इसके साथ यह भी वर्णनीय है कि पूज्य बेपरवाह मस्ताना जी महाराज स्वयं उस दिन के बाद, आप जी को भेंट की गई इस अनामी गुफा में कभी नहीं गए बल्कि आश्रम में एक अलग कमरे में रहे।

दुनिया में बज रहा है डंका

परम पूजनीय परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज वाली दो जहान ने 23 सितंबर 1990 को मौजूदा गद्दीनशीन पूज्य हजूर पिता संत डा. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां को अपने पवित्र कर-कमलों से शहनशाही स्टेज पर विराजमान कर गुरगद्दी बख्शिश की और अपना स्वरूप देकर कुल दुनिया के सामने डेरा सच्चा सौदा के तीसरे गुरू, तीसरे पातशाह के रूप में जाहिर किया। आप जी लगभग सवा साल तक पूज्य हजूर पिता जी के साथ स्टेज पर विराजमान रहे और लोगों में किसी भी शंका की गूंजाइश नहीं छोड़ी। इस लम्बी अवधि तक, दोनों पातशाहियां साथ-साथ प्रकट स्वरूप में रहने के बाद आप जी ने 13 दिसम्बर 1991 को ज्योति जोत समा कर, अपने आप को भी पूर्ण तौर पर पूज्य गुरू जी के मौजूदा जवान स्वरूप में ही परिवर्तित कर लिया।

शाह सतनाम जी महाराज स्वयं अब तीसरे पातशाह के रूप में मौजूद हैं। डेरा सच्चा सौदा का, राम-नाम की सच्चाई व ईमानदारी का आज पूरी दुनिया में डंका बज रहा है। पूज्य हजूर पिता जी की पावन रहनुमाई में डेरा सच्चा सौदा चहुं दिशाओं में अपने मानवीय कल्याण कार्यों की गंगा बहा रहा है। पूज्य गुरू जी समाज में नया बदलाव लाने के उद्देश्य से दिन रात जुटे हुए हैं। पूज्य गुरू जी के अनथक प्रयासों की बदौलत आज देश-दुनिया में छह करोड़ से भी ज्यादा लोग नशा, भ्रष्टाचार, वेश्यावृति आदि सामाजिक बुराइयों को छोड़ कर राम-नाम, ईश्वर मालिक की भक्ति से जुड़े हुए हैं। घर-घर में प्रेम-प्यार की बयार बह रही है।

लाखों अनुयायी यहां हर रोज पूज्य गुरू जी के दर्शनों को आते हैं और अपनी आत्मा को रब्बी इश्क में लबालब कर रहे हैं। रूहानी खुशियों का ऐसा नजारा डेरा सच्चा सौदा के अलावा नामुमकिन है। पूज्य हजूर पिता जी अपने मुर्शिदे-कामिल के वचनानुसार अपनी हर कोशिश, हर तरीके से समाज व मानवता के भले के लिए दिन-रात प्रयासरत हैं। डेरा सच्चा सौदा देश-दुनिया में अपने अलौकिक गुणों का प्रसार कर रहा है। दिल से यही कामना है कि हर कोई इन खुशियों को ग्रहण करे तथा अपने जीवन को खुशहाल बनाए।