सुहाग का प्रतीक चूड़ियां :

चाहे कोई त्योहार हो या कोई उत्सव, युवतियां अपने श्रृंगार में चूड़ियों को सबसे पहले शामिल करती हैं। वैदिक युग में चूड़ियों को कलाइयों की शोभा मात्र के लिए पहना जाता था लेकिन मध्यकालीन भारत में इसे सुहाग का प्रतीक मान लिया गया। वर्त्तमान में सुहाग के अमर प्रतीक के रूप में देश के सभी हिस्सों मे महिलाएं चूड़ियां पहनती हैं।

उत्खनन से मिली पुरातात्विक सामग्री प्राचीन शिल्प कृतियों एवं ग्रंथों में किये गये उल्लेखों में विविध प्रकार के कंगन और भुजबंधों के अलंकरण का उल्लेख है। हड़प्पा व मोहनजोदड़ो की खुदाई में जो प्रमाण मिले, उससे यही परिलक्षित होता है कि उस सभ्यता के लोग अपनी कलाई में कंगन या कंगन जैसा कोई आभूषण पहनते थे। ये आभूषण सोने, चांदी तथा तांबे जैसी किसी धातु के बने होते थे।

महाभारत में वृहन्नला रूप अर्जुन के शंख वलय अर्थात शंख से बने कंगन पहनने का वर्णन है। रामायण में उल्लेख है कि जब रावण सीता को हर कर ले जा रहा था तो उन्होंने अपने कंगन सहित अन्य आभूषण रावण के विमान से नीचे गिरा दिये थे। मौर्यकालीन और गुप्तकालीन संस्कृति में कई जगह विविध प्रकार की आकर्षक चूड़ियां पहनने का जिक्र है।
बदलते हुए फैशन में अब अविवाहित लड़कियां भी रंग-बिरंगी चूड़ियां पहनने लगी हैं।

भारत के विविध प्रांतों में अलग-अलग तरह की चूड़ियां पहनने का रिवाज है। कहीं लाख की, कहीं हाथी दांत की तो कहीं प्लास्टिक की भी चूड़ियां पहनी जाती हंै लेकिन कांच की चूड़ियां अपने चमक-दमक और आकर्षक रंग-रूप के कारण महिलाओं में एक अलग स्थान संजोये हुए हैं। सैंधव संस्कृति में स्त्री जहां हाथों में मोटे कड़े तथा कुहनी के ऊपरी भाग में भुजबंध धारण करती थी वहीं आज भी राजस्थान, गुजरात आदि क्षेत्रों में कुछ जनजाति की महिलाएं कलाई से बाहुमूल तक चूड़ियां पहनती है।

फैशन के बदलते दौर में कई रंगों की चटकदार चूड़ियां अब बाजार में आ गयी हैं। महिलाएं अपने परिधान के रंगों के साथ चूड़ियों के रंगों को मिलाने लगी हैं। यूं तो कांच की चूड़ियों के लिए उत्तर प्रदेश का फीरोजाबाद कस्बा सबसे ज्यादा प्रसिद्घ है लेकिन पुरातत्ववेत्ताओं का मानना है कि सबसे पहले कांच की चूड़ियां दक्षिण में बहमनी सुल्तानों के शासन काल (1347 से 1525) ई. में थी।

इसके बाद मुगलकाल में इन चूड़ियों का प्रचलन हुआ और फिरोजाबाद चूड़ियों के निर्माण के लिए पूरे भारत देश में प्रसिद्घ हो गया। पुरातत्ववेत्ताओं का कहना है कि 1863 में वहां कांच की चूड़ियां बनाने का काम प्रारंभ हुआ लेकिन स्थानीय नागरिकों का दावा है कि कस्बे की स्थापना से पहले भी यहां चूड़ियां बनाने का काम होता था।

फिरोजाबाद में लाल मिट्टी काफी अधिक मात्रा में मिलने के कारण चूड़ी निर्माण का काम वहां काफी फला-फूला। उस समय लोग जस्ता, तांबा, रांगा, शीशा आदि धातुओं को जला-कर उनकी भस्म से चूड़ियां बनाते थे। जिन भट्टियों में उसे बनाया जाता था उन्हें छाल मिट्टी कहते थे। प्रारंभ में चूड़ियां काफी मोटी और साधारण हुआ करती थी लेकिन धीरे-धीरे उनके रंग रूप में निखार आता चला गया और उद्यमियों ने विदेशों से कांच आयात करना प्रारंभ कर दिया। आधुनिकता के साथ-साथ चूड़ियों के डिजाइन और रंगरूप में भी बदलाव आया। गुणवत्ता और विविधता के कारण चूड़ियों की मांग भी निरन्तर बढने लगी।

आजकल फैशनपरस्त नयी पीढी धातु, प्लास्टिक और सोने की चूड़ियां पसंद करती हैं। फीरोजाबाद की कांच की चूड़ियों के साथ-साथ हैदराबाद की पत्थर की चूड़ियां और राजस्थान की लाख की चूड़ियां भी बड़े चाव के साथ पहनी जाती हैं। लाख से बनी चूड़ियों को ‘लहठी’ भी कहा जाता है। समय में बदलाव के साथ-साथ लहठियों के रंग रूप में भी बदलाव आया है।

राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में तो कुछ वर्ष पूर्व तक सभी जाति की महिलाएं नारियल की चूड़ियां पहनना पसंद करती थी। ‘बगड़ी’ नामक नारियल की चूड़ी नारियल की गोलाई समेटे होती हैं।

चूड़ी को आकार देने के लिए नारियल के ऊपर का रेशा हटाकर अंदर का खोपरा निकाल लिया जाता है और नरम होने के लिए खोल को पानी में भिगो देते हैं। खोल को आवश्यकतानुसार काटकर किनारे को रेती से साफ किया जाता है। नारियल से ज्यादातर बंजारा चूड़े बनते हैं जिन्हें ‘बंजारा’ जाति के लोग पसंद करते हैं।

बंगाल में प्रचलित शंख की चूड़ियों में लोगों को काफी विश्वास है। शंख की चूड़ियां शरीर में कैल्शियम की कमी को पूरा करती है और इसे पहनने से खून और पित्त की बीमारियां भी नहीं होती।

कई सभ्यताओं के अन्तराल के बाद भी आज की आधुनिक नारी में चूड़ी का महत्त्व कम नहीं हुआ है। आज भी चूड़ी सुहागिनों के सुहाग को गौरवान्वित करती है।

शादी-विवाह अथवा तीज-त्योहार पर इन चूड़ियों का विशेष महत्त्व है। महिलाओं का श्रृंगार इनके बिना अधूरा है। चूड़ी को प्रत्येक समाज तथा धर्म की मान्यता प्राप्त है इसीलिए हर समाज एवं वर्ग की महिलाओं के बीच यह काफी लोकप्रिय है।
बांह से कलाई तक चूड़ी पहनने की राजस्थानी परम्परा भले ही आज समाज में गौण होती जा रही है परन्तु फैशन की दृष्टि से इसकी विशिष्टता बरकरार है। विवाह पर चूड़ी संस्कार सभी जातियों में होता है।

इन दिनों महिला जगत में वैचारिक विरोधाभास कुछ इस तरह गहराया है कि सदियों से चूड़ियों को सुहाग एवं श्रृंगार का एक अध्याय मानने वाली यह महिलायें चूड़ी को दासत्व की निशानी मान कर इसका परित्याग करने लगी हैं। जरा सोचिये, इतनी पुरानी परम्परा से झटके में दामन छुड़ा पाना कितना-न्यायसंगत है?
– संजय कुमार ‘सुमन’