स्वच्छता और प्राकृतिक सौन्दर्य की धरोहर-चंडीगढ़ :

एकात्म भारत में लाहौर अन्य शहरों की तरह सुन्दरतम शहर गिना जाता था मगर भारत विभाजन के पश्चात् लाहौर पाकिस्तान में चला गया। लाहौर के पाकिस्तानी हिस्से में जाने के कारण भारत के ख्यातनाम नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू को बहुत दु:ख हुआ हालांकि यह दु:ख केवल नेहरू जी के अकेले का ही नहीं था बल्कि समस्त भारतीयों का दु:ख था। लाहौर की मधुर स्मृति को भुलाने के रूप में 1953 में चंडीगढ शहर की आधारशिला रखी गयी।

ली-कार्बूजिए सहित तीन अन्य वास्तुशिल्पों की परिकल्पना का साकार स्वरूप है चंडीगढ। फ्रांसीसी वास्तुकार ने चंडीगढ को ऐसा रूप दिया है कि यहां गली, मोहल्लों, चौक का नामो-निशां नहीं है, साथ ही कॉलोनियों का भी अभाव है। लगभग पचास सेक्टरों में विभाजित यह शहर स्वच्छता हरियाली, चौड़ी-चौड़ी सड़कों के लिए विश्व-प्रसिद्घ है। बंगलुरु जैसी स्वच्छता से साम्यता रखने वाला यह शहर भारत के आधुनिक शहरों में से एक है।

इस शहर का खुला माहौल, पूर्व नियोजित मकान, बाजार यह परिवेश किसी भी आगन्तुक को भाव विभोर कर डालते हैं। यह पंजाब और हरियाणा की संयुक्त राजधानी है। शिवालिक पहाड़ियों की तलहटी में बसा होने के कारण चंडीगढ की सुन्दरता भी अप्रतिम है। सभी प्रकार की नागरिक सुविधाओं से आबद्घ, प्रदूषण से रहित, खुला-खुला सा, हरियाली से भरपूर चंडीगढ चंडीदेवी के नाम पर बसा है।

सड़क द्वारा यह शहर देश के लगभग सभी छोटे-बड़े शहरों से सीधा जुड़ा हुआ है। रेलमार्ग द्वारा भी यह पर्यटकों के लिए सुगम मार्ग है तथा वायु सेवाएं भी यहां मुहैया हैं। यहां का इन्टरनैशनल एयरपोर्ट शहर से लगभग 10 कि॰ मी॰ की दूरी पर ही अवस्थित है जहां से आप टैक्सी द्वारा गन्तव्य स्थल तक पहुंच सकते हैं। वैसे तो चंडीगढ का भ्रमण आप पूरे वर्ष भर में कर सकते हैं मगर उत्तम समय के हिसाब से फरवरी से अप्रैल तथा अक्टूबर से मध्य दिसम्बर तक समय उपयुक्त रहता है।

चंडीगढ के दर्शनीय स्थल :

सुखना झील :-

यह 15 वर्ग किमी॰ में फैली कृत्रिम झील है जहां वाटर स्पोटर््स का मजा लिया जा सकता है शिवालिक पर्वत श्रृंखलाओं से घिरी यह झील नयनाभिराम है यहां किराये पर बोट चलाने की सुविधा है सुबह-सायंकाल यहां पर्यटकों का तांता लगा रहता है। यहां पर आप नाव चलाते समय मछली क्रीड़ा का आनन्द उठा सकते हैं इसके लिये संबद्घ अधिकारी से अनुमति लेनी पड़ती है।

पैडल बोट चलाते समय यहां बहुत मजा आता है। पर्यटक की इच्छा होती है कि वह घंटों तक बोटिंग करें। कई रंगों व आकारों वाली बतखें तथा प्रवासी पक्षियों के झुण्ड वातावरण में चार चांद लगा देते हैं। यहां वर्ष में एक बार झील की सफाई का अभियान चलता है। उस समय अधिक से अधिक लोग यहां श्रमदान करते हैं।

रोज गार्डन :-

सेक्टर 16 में अवस्थित यह गुलाब उद्यान है। गुलाब के फूलों की सैकड़ों प्रजातियां यहां पर हैं। लगभग दो हजार से ज्यादा किस्मों वाले गुलाबों का यह उद्यान भारत के पूर्व राष्ट्रपति डा॰ जाकिर हुसैन के नाम पर स्थापित है। यह उद्यान लगभग 35 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। प्रतिवर्ष फरवरी माह में तीन दिनों का यह गुलाब उत्सव मनाया जाता है जिसमें एशिया की सबसे बड़ी गुलाब प्रदर्शनी लगाई जाती है।

खुले तथा हवादार वातावरण में स्थित इस रोज गार्डन में लगभग सौ फुट ऊंचा फव्वारा पर्यटकों को बरबस अपनी ओर आकर्षित करने से नहीं चूकता। पर्यावरण प्रेमी तथा फोटोग्राफर्स इस उद्यान का जमकर लुत्फ उठाते हैं। तीन दिवसीय गुलाब महोत्सव के उत्सव पर सैकड़ों गुलाब प्रेमी यहां इकट्ठे होते हैं।

रॉक गार्डन :-

25 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ यह गार्डन सचमुच में ही चंडीगढ का अजूबा है। इस गार्डन का निर्माण शहरों और उद्योगों से निकलने वाले कचरे, बेकार नाकारा वस्तुओं, टूटी-फूटी चीजों, कांच की चूड़ियों, पेपरवेटो, प्लेटों आदि को उपयोग में लेते हुए, विभिन्न प्रकार की आकृतियां टेढीमेढी घुमावदार पगडंडियां, जानवरों की मूर्तियां, खिलौनों, किसानों, सैनिकों सहित अनेक प्रकार के जीव-जन्तुओं व विभिन्न प्रकार के पशु-पक्षियों की रचनाएं गढी गई हैं।

यहां के कृत्रिम झरने, पहाड़ तथा विचित्र संरचनाओं से किसी अन्य ही मायालोक का आभास होता है। यह गार्डन शिल्पकार नेकचंद सेन की परिकल्पना का साकार रूप है। सुबह दस बजे से शाम 6 बजे तक तीन चरणों के अन्तर्गत रॉक गार्डन पर्यटकों के लिए खुला रहता है। मुख्य बस अड्डे से रॉक गार्डन के लिये बसें उपलब्ध रहती हैं।

छतबीड़ चिड़ियाघर :-

चंडीगढ से लगभग 20 किमी॰ दूर यह चिड़ियाघर अवस्थित है। इसको महेन्द्र चौधरी जुलोजिकल पार्क के नाम से भी जाना जाता है। यह 25 एकड़ वन्य भूमि में फैला हुआ है। घग्घर नदी के किनारे अवस्थित यह चिड़ियाघर वास्तव में दर्शनीय है जहां शेर जैसा जानवर भी खुलेआम घूमता है।

पर्यटकों को बंद गाड़ियों में यहां पर घुमाया जाता है। चीता, शेर तथा अन्य खूंखार जानवरों को पेड़ों के झुरमुटों के बीच से जब पर्यटक बंद गाड़ी में करीब से निहारते हैं, तब चंडीगढ क्षेत्र का पर्यटन काफी रोमांचक लगता है। चंडीगढ से यहां के लिए विशेष बसें जाती हैं। रविवार के दिन यहां खासी भीड़ रहती है।

मोरनी हिल्स :-

यह चंडीगढ से 45 किमी॰ दूर लगभग 3000 फुट की ऊंचाई पर अवस्थित है। यह चंडीगढ के निकट का हिल स्टेशन है जिसे चंडीगढ का शिमला कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। केवल चंडीगढ ही नहीं, राजधानी दिल्ली के भी सबसे निकट का यह हिल स्टेशन है जहां मात्र 6-7 घंटे में पहुंचा जा सकता है।

पूर्व समय में गोरखाओं का यहां शासन था, इसी कारण से मोरनी में प्राचीन किला व टिक्कर ताल भी देखने योग्य हैं। इस हिल स्टेशन का 80 प्रतिशत क्षेत्र वनों के लिये आरक्षित है। यहां भी वन्य जीवों के दर्शन किये जा सकते हैं। स्पूकी हारर हाऊस, रिवर टैक, समलौठा देवी का मंदिर, हर्बल गार्डन आदि अन्य यहां के दर्शनीय स्थल हैं। रात्रि के समय यहां से चंडीगढ के जगमगाते भव्य नजारे देखे जा सकते हैं।

कैक्टस गार्डन :-

यह चंडीगढ के एकदम नजदीक स्थित पंचकूला शहर में अवस्थित है। कुल 6 एकड़ क्षेत्र में बना यह गार्डन एशिया महाद्वीप का सबसे बड़ा कैक्टस गार्डन है। घड़े व फुटबॉल की आकृति के कैक्टसों की यहां पर लगभग ढाई हजार प्रजातियां हैं जिनको हम चंद रूपयों के टिकट में देख सकते हैं। यह चंडीगढ के आस-पास का अजूबा क्षेत्र है जहां आने के पश्चात् पर्यटक भावविभोर हुए बिना नहीं रह सकता।

बोगनवेलिया गार्डन :-

झाड़ियों के घनत्व के बीच लटकती लताओं से ओत-प्रोत बोगनवेलिया गार्डन बसंत ऋतु का आभास कराता है। सुर्ख-लाल, पीले, सफेद, गुलाबी, रंगों के गुच्छे सभी का यहां मन मोह लेते हैं। 20 एकड़ क्षेत्र में फैला यह सुगंधमय गार्डन वास्तविक इत्र की महक, एक प्रकार से प्रदान करता है।

पंचकूला तथा पिंजौर चंडीगढ के निकटतम अन्य दर्शनीय स्थल हैं जिनमें पूर्व में उल्लेखित स्थानों के अलावा अन्य स्थान देखने योग्य हैं। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट, सैक्ट्रीएट , केन्द्रीय संग्रहालय लेजर वैली, पंजाब विश्वविद्यालय, कलाग्राम चंडीगढ के अन्य दर्शनीय स्थल हैं।

विविध प्रकार के खाने तथा ठहरने की सुगम व्यवस्था पर्यटकों को सुखद अहसास कराती है। पर्यटक केवल इस बात का विशेष ध्यान रखें कि टैक्सीवाले इत्यादि जो कहें, उसमें न ठहरें क्योंकि वहां अधिक व्यय होने की संभावना रहती है। पहले से ही किसी होटल आदि में बुकिंग करवा लें।
– पवन कुमार कल्ला

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