एक अच्छा शौक है डाक टिकट कलैक्शन

डाक टिकट एक छोटा कलात्मक और ऐतिहासिक दस्तावेज होता है जो किसी भी राष्ट के इतिहास के साथ-साथ इसके प्राचीन एवं अर्वाचीन कार्यकलापों को अभिव्यक्त करता है।

विश्व के लगभग सभी देश प्रतिवर्ष विभिन्न विषयों पर डाक टिकट जारी करते हैं। डाक टिकट संग्रह करने के शौक को ‘फिलैटिली’ कहते हैं और डाक टिकट जमा करने के शौकीन लोग ‘फिलैटेलिस्ट’ कहलाते हैं।

डाक टिकट, जो कुछ व्यक्तियों के लिए सिवाय रंगीन कागज के चंद टुकड़ों के अलावा और कुछ नहीं होते, वहीं कागज के ये नन्हे-नन्हे टुकड़े मिनटों में ही किसी भी देश के इतिहास, संस्कृति, कला और ज्ञान-विज्ञान की जानकारी सहजता से दे देते हैं। वास्तव में एक डाक टिकट अपने-अपने देश के वे छोटे-छोटे राजदूत हैं जिनके द्वारा संसार में बंधुत्व की भावना एवं शांति का संदेश फैलता है। किसी भी देश में प्रचलित डाक टिकट स्वयं में विशिष्ट तरह के प्रमाण पत्र होने के साथ-साथ उस देश की वस्तुस्थिति के अभिलेख भी होते हैं।

विश्व में प्रतिवर्ष औसतन लगभग दस हजार नए डाक टिकट जारी होते हैं। डाक टिकटों का आकार आयताकार, चौकोर, त्रिभुजाकार, गोलाकार, हृदयाकार या अन्य किसी भी आकृति का हो सकता है। डाक टिकट संकलन करने का शौक बच्चों से लेकर बूढ़ों तक में समान रूप से लोकप्रिय बना रहता है। डाक टिकट इकट्ठे करने का शौक ‘द हॉबी आॅफ किंग्स एंड द किंग आॅफ हॉबीज’ कहलाता है। इंग्लैंड के राजा जार्ज पंचम, फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट जैसे कई प्रसिद्ध व्यक्तियों को भी डाक टिकट जमा करने का शौक था।

डाक टिकट संग्रह करने के कुछ तरीके:-

* घर में आने वाली डाक से।

* मित्रों, सगे-संबंधियों के माध्यम से।

*डाकघर से खरीदकर।

* समान रूचि वाले व्यक्ति से पत्र-मित्रता करके।

* बाजार से संग्रह करने के लिए बिकने वाले डाक टिकटों को खरीदकर।

पुरानी डाक टिकटों की कीमत आज डाक टिकट संग्रह के बढ़ते विश्वव्यापी शौक के कारण बहुत बढ़ गई है।
किसी भी डाक टिकट का मूल्य उसकी दुर्लभता से जुड़ा होता है।

डाक टिकट निम्नलिखित कारणों से भी दुर्लभ हो जाते हैं:-

*नया डाक टिकट, जिस पर पुराने प्रचलित डाक टिकट के डिजाइन का भी कुछ अंश छप गया हो।

* टिकट किसी दूसरे रंग में छप गया हो।

* टिकट आधा ही छपा हो।

* टिकट में भाषा, डिजाइन आदि की कोई त्रुटि रहने के कारण वह सीमित संख्या में ही छपा हो।

इस प्रकार डाक टिकट संग्रह का शौक न केवल ज्ञानवर्द्धक है, बल्कि मनोरंजक भी है।

– अनिल कुमार