ये है रूहानी जाम ‘जाम-ए-इन्सां गुरु का’ 10 वीं वर्षगांठ :

इन्सानियत को बल बख्शता है, रूहानी जाम सोई इन्सानियत को जगाता है, रूहानी जाम। मृतप्राय: इन्सानियत को पुनर्जीवित करता है रूहानी जाम। अंधों कारोशनी बख्शता है रूहानी जाम। गूंगों से ज्ञान करवा देता है रूहानी जाम। सूनी कोख को खुशी बख्शता है यह रूहानी जाम। कैंसर, एडस जैसी भयानक बीमारियों को जड़ से उड़ा देता है गुरु जी का जाम-ए-इन्सां, ये रूहानी जाम। बिगड़े काम बना देता है यह रूहानी जाम। दृढ़ विश्वास, आत्म बल को बढ़ाता है यह जाम-ए-इन्सां, रूहानी जाम। सच्ची श्रद्धा-भावना से पीओ और खुशियां भरी जिंदगी जीओ आदि सद्गुणों से भरपूर है यह रूहानी जाम ‘जाम-ए-इन्सां गुरु का’।

ताकि सब इन्सान बनें।

कहने को तो हम सब इन्सान हैं। नाम बेशक इन्सान है, लेकिन इन्सानियत तो किसी-किसी में ही नजर आती है।

इन्सानियत क्या है:-

पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने इन्सानियत को परिभाषित करते हुए फरमाया कि किसी को गम, दुख दर्द में तड़पता देखकर उसकी यथा संभव सहायता करना उसके दु:ख-दर्द को दूर करने की कोशिश करना, पीड़ित, दुखिए की मदद करना (तन-मन-धन यानि अपने उपलब्ध साधनों से) ही सच्ची आदमियत सच्ची इन्सानियत है। और इसके विपरीत किसी को दुख-दर्द में तड़पता देखकर ठहाके लगाना उसका उपहास (मजाक) उड़ाना, किसी गरीब को सताना, उसकी मजबूरी को अपने स्वार्थ के लिए प्रयोग करना, यह शैतानियत है, राक्षसीयन है। अब खुद ही अपने अंदर में झांक कर देखें कि हम कहां पर खड़े हैं! क्या हम सच में इन्सान हैं? क्या सच में हमारे अंदर इन्सानियत के गुण हैं?

जब कभी इन्सान और इन्सानियत की बात आती है तो लोग अकसर आग-बबूला हो जाते हैं कि हम इंसान नहीं तो और क्या हंै? तो वो खुद ही सोचें कि अगर पूज्य गुरु जी द्वारा दर्शाए इन्सानियत के गुण उनके अंदर नहीं हैं तो वे अपने को इन्सान नहीं, धर्मों के अनुसार, राक्षसों की श्रेणी में शामिल समझें। कोई बुरा मत मानिए, बल्कि इन्सानियत के गुणों को धारण कर समाज में अपना मान-सम्मान बढ़ाईए। पूज्य गुरु जी के अनुसार नीति और नियति अर्थात नेकी-भलाई, रूहानियत के मार्ग पर साफ दिल से चलना, अच्छी नियति से सबके प्रति सदव्यवहार करना तथा कर्मयोगी और ज्ञानयोगी बनना, सही मायनों में यानि प्रैक्टीकल रूप में, तो वह इन्सान जो इन्सानियत के गुणों से भरपूर है और वो वह ही एक सच्चा इन्सान है।

जाम-ए-इन्सां की शुरूआत:-

पूरे समाज का भला हो, पूरी कायनात और इन्सानियत का भला हो, इन्सानियत सुखी रहे, लोगों में इन्सानियत के गुण पैदा हो, लोग एक-दूसरे से बिना भेद भाव के सच्चा व्यवहार करें, परस्पर नि:स्वार्थ भावना से प्यार करें, समाज में प्यार-मुहब्बत की गंगा बहे, अर्थात कुल लुकाई, सारी खलकत का भला हो और केवल और केवल, इसी उद्देश्य से ही पूज्य गुरु, जी ने जाम-ए-इन्सां (रूहानी जाम) पिलाने की रीत चलाई है।

क्योंकि एक सच्चा गुरु, पीर-फकीर ही समस्त लोगों के हित, लोगों की भलाई के बारे सोच सकता है। क्योंकि वो खुद अल्लाह, राम, वाहिगुरु, गॉड, खुदा, रब्ब का अवतार होता है। स्वयं भगवान ने ही उसे लोगों को परस्पर जोड़ने, उन्हें राम-ईश्वर से मिलाने के लिए संसार में भेजा होता है। दूसरे शब्दों में, वो भगवान का नुमाइंदा होता है और जीव-सृष्टि पर अवतरित होकर समस्त जीव-जगत की भी नुमाइंदगी करता है, सबको नेक रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करता है। और केवल वो ही सच्चा गुरु, कोई सच्चा पीर-फकीर ही सृष्टि पर यह परोपकार कर सकता है।

इस उद्देश्य को मुख्य रखते हुए पूज्य गुरु जी ने आज के दिन 29 अप्रैल को, आज से नौ वर्ष पहले यानि वर्ष 2007 में, जाम-ए-इन्सां, रूहानी जाम की शुरूआत की है और आज के दिन की महत्ता को दर्शाते हुए पूज्य गुरु जी ने इसे ‘जाम-ए-इन्सां गुरु का’ नाम दिया है और यह दिन इसी पवित्र नाम से विश्व प्रसिद्ध है।

‘इन्सां’ की यह रीत-ओ-रस्म जो पूज्य गुरू जी ने 29 अप्रैल को शुरू की, अपने आप में बेमिसाल है। क्योंकि जब भी कोई धारा अपना राह बनाती है तो उसकी अपनी पहचान भी लाजिमी हो जाती है। ‘इन्सां’ भी आज के युग की एक नई विचारधारा है जो इन्सानियत के प्रहरी के रूप में सृजत की गई है। इसलिए इसका भी नामाकरण जरूरी था और जिसे ‘इन्सां’ के नाम से नवाजा गया। स्वयं पूज्य गुरू जी ने अपने नाम के साथ ‘इन्सां’ को सजा कर इस धारा का प्रकटीकरण किया। इस धारा का उद्गम जिस संगम से हुआ, उसे ‘रूहानी जाम’ अर्थात ‘जाम-ए-इन्सां गुरू का’ कहा गया है।

इन्सानियत के लिए कसम:

‘इन्सां’ बनने के लिए ’ रूहानी जाम ग्रहण करने वाला कसम खाता, यह प्रण लेता है कि वो इन्सानियत की रक्षा हेतू कभी पीछे नहीं हटेगा। पूज्य गुरू जी पांच अंजुलियां भर कर उससे यह कसम लेते हैं, प्रण करवाते हैं कि वो मानवता-इन्सानियत को मरने नहीं देगा और इसके लिए जो 47 नियम (समाज भलाई के लिए) बनाए गए हैं, उन पर वह दृढ़ता से चलेगा। पूज्य गुरू जी के सानिध्य में ऐसा पाक प्रण करके आज करोड़ों लोग इन्सानियत के रक्षा सूत्र में बंधे हैं व दिन-प्रतिदिन बंध रहे हैं।

दिवस की महता :-(सर्व सांझा त्यौहार)

दुनिया को इन्सानियत की ऐसी राह दिखाने वाला 29 अप्रैल का यह दिन, एक साथ दो महत्वपूर्ण नजारों का दृष्टवा है। क्योंकि आज से 68 वर्ष पूर्व इसी दिन अर्थात 29 अप्रैल सन 1948 को डेरा सच्चा सौदा के संस्थापक शहनशाह मस्ताना जी महाराज ने डेरा सच्चा सौदा की नींव रखी थी। सार्इं मस्ताना जी महाराज ने सरसा शहर से 2 किलोमीटर दूर एक सुनसान वीराने में डेरा सच्चा सौदा का निर्माण कर जंगल में मंगल बना दिया।

इस प्रकार 29 अप्रैल 1948 का दिन डेरा सच्चा सौदा के अस्तित्व का दिन है, और दूसरा, यह कि आज से 9 वर्ष पहले यानि इसी दिन 29 अप्रैल 2007 को जब पूज्य गुरू संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने ‘रूहानी जाम’ शुरू करके इन्सानियत की मशाल जगाई तो दुनिया-भर में इस पवित्र नाम का डंका गूंज उठा। इसलिए (29 अप्रैल) आज का दिन ‘डेरा सच्चा सौदा में ‘रूहानी स्थापना दिवस’ तथा ‘जाम-ए-इन्सां गुरु का’ दिवस को पवित्र भंडारों की तरह धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस पाक दिवस का नजारा देखते ही बनता है।

सब धर्मों के त्यौहार इस दिन एक साथ मनाए जाते हैं जिसे निहार कर हर कोई आत्म-विभोर हो जाता है। चहुं तरफ सर्वधर्म संगम का प्रत्यक्ष दृश्य हर दिल को लुभाता है। देश-विदेश से लाखों अनुयायी इस दिन पूज्य सतगुरु जी के रहमो-करम, मालिक की खुशियों को बटोरने, नजारों को लूटने के लिए पूरे उत्साह के साथ पहुंचते हैं। इस पवित्र भंडारे की ख्ुाशियां, रंगतें, मौजें, लहरें, सौगातें तन-मन व रूह को मोह लेती हैं जिनके नशे में रूह खिलखिला उठती है। पूज्य गुरू जी की नूरानी अदाओं का दर्श-दीदार हर रूह को मदमस्त कर देता है।

पूज्य गुरू जी के इलाही सरूर की फुहारें मन को अंदर तक शीतलता से भर देती हैं। आओ, इस रूहानी मदमस्ती के दौर में जमकर भीग जाएं। जिसमें तर-ब-तर हुआ रोम-रोम कह उठता है, ‘वाह, मेरे मौला! वाह, मेरे मौला!

पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने रूहानी जाम की शुरूआत करके मृत प्राय: मानवता को अपना सहारा दिया और उसे पुनर्जीवित कर इन्सान के सम्मान को बढ़ाया है। जैसा कि पहले बताया गया है कि डेरा सच्चा सौदा सर्वधर्म संगम है, इसलिए सभी धर्मांे के त्यौहार भी इसी दिन, ‘रूहानी स्थापना दिवस’ के रूप में मनाए जाते हैं। इस दिन की महत्ता तथा भंडारे की रंगीनियां व चहल पहल हर मन को मोह लेती है।

लाखों की संख्या में लोग (हिंदू-मुस्लिम, सिख, ईसाई आदि सभी जात-धर्म से) देश-विदेश से इस दिन के पवित्र सत्संग समागमों में शिरक्त कर अपने मुर्शिदे-कामिल का पावन आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। और इस प्रकार चहुं ओर प्रेम-प्यार, हमदर्दी व रूहानियत की बरसती फुहारों से निकलने को दिल नहीं करता।

आईए, हम भी सब मिलकर जात, धर्म व ऊंच नीच के भेदभाव को मिटाकर इस पवित्र संगम में रम जाएं। सच में, ‘मस्ती भरी है साकिया तेरे इस मयखाने दे विच’…….! सतगुरु के प्यार व मस्ती भरे रंग में रंगा हर शख्स झूम उठता है। गा उठता है। कह उठता है, धन्य है मेरे मौला, धन्य है मेरे रहबर। इस पवित्र दिन 29 अप्रैल की इस 69वें रूहानी स्थापना दिवस एवं जाम-ए-इन्सां गुरु का की 10वीं वर्ष गांठ की, बहुत-बहुत मुबारकां जी।

-मुबारक हो! मुबारक हो!  —::::—